सौभाग्य से मिलता है सेवा का अवसर
त्रिगुणमयी माया क्यु मनुष्य को जीव मुक्त नहीं होने देती।
माया त्रिगुणमयी है। सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण। प्रत्येक जीव के चौबीस घंटे का कर्मफल, माया तीन भागों में बांट कर अलग अलग संस्कार की खजानों में जमा कर देती है। जैसे :-भजन, कीर्तन, ध्यान, स्मरण, स्वाध्ययन, योग, जप, तप, व्रत, यम, नियम, सत्संग एवं संयम इत्यादि में जो समय व्यतीत होता है, उनके कर्मफल सतोगुण के खजाने में जमा होते हैं।
दूसरा खान, पान, ऐश, आराम, खेती, गृहस्थी, रोजगार, व्यापार, गप्प-शप्प एवं राजनैतिक क्षेत्र का कार्य इत्यादि में जो समय व्यतीत होता है, उनके कर्मफल रजोगुण के खजाने में जमा होते हैं।
तीसरा परनिन्दा, (शिकायत),
गाली ग्लौज, बुरे व्यवहार की बातचीत, चोरी, डकैती चुगलखोरी, ताड़ी,
दारू, शराब पीना बासी तथा उच्छिष्ट भोजन एवं
शयनावस्था (निद्रा ) में जितने भी समय
खर्च होते हैं, सभी के कर्मफल तमोगुण के खजाने में संचित होते
हैं।
सतोगुण अधिक होने पर देवयोनि की प्राप्ति होती है। रजोगुण अधिक होने
पर मनुष्य योनि मिलता है। तथा तमोगण संस्कार अधिक होने पर पशु, पक्षी, कोड़े मकोड़े इत्यादि नीच योनियों को
प्राप्ति होती है।
Sahi he
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