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सौभाग्य से मिलता है सेवा का अवसर

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नेक राह के मुसाफिर हम सुबह से रात तक अपनी व्यक्तिगत व पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझे रहते है , ऐसे में हम अपने सामाजिक कर्तव्य को भूल जाते हैं। ईश्वर ने हमें इस योग्य जरूर बनाया है कि हम थोड़े - थोड़े सहयोग से किसी जरूरतमंद की मदद कर सकें , यह सेवा का सौभाग्य हमें किसी न किसी के माध्यम से मिलता रहता है। सर्दी में ठिठुरते जरूरतमंदों के दर्द को देखकर कुछ लोग अपने दो कदम बढ़ाकर मुहिम शुरू कर देते है देखते ही देखते वह कारवाँ बन जाती है , बड़े कार्य की शुरुआत हमेशा पहले दो कदम से होती हैं , कुछ लोग इस कहावत को सही साबित कर देते है।   एक ऐसा ही मुहिम नैक राह के मुसाफिर के टीम लीडर स्वरुप जी सोलंकी सर और केशव जी सर के सहयोग से पूर्ण हुआ।   इन लोगों ने कुछ मित्रगणों का एक ग्रुप बनाया इस समूह में साथियों ने दिल खोलकर सहयोग किया है , जरूरतमंदों के लिए 100 से भी ज्यादा कम्बल खरीदना अपने आप में प्रेरणादायक व अनुकरणीय कार्य था।     " वस्त्रदान अभियान" में 10 दिसम्बर ( शनिवार ) को रात्रि 8 बजे से जोधपुर शहर के प्रमुख स्थानों पर जरूरतमंद लोगों को सर्दी से बचाव हेतु कम्बल ...

मानवजाति ईश्वर की र्स्वश्रेष्ठ रचना है और हम उनकी संतान है

 मानवजाति ईश्वर की र्स्वश्रेष्ठ रचना है और हम उनकी संतान है


dhayan prachin gyan



प्राचीन समय से हमें ज्ञान मिलता चला आ रहा है कि हम सभी संतान है उस परमात्मा के ये बात भुल नहीं जाना चाहिए। ऋषि-मुनियो द्वारा उनके दिए हुए उपदेशों में, लिखे गए ग्रंथो में और अनेक धर्म समुदायों द्वारा भी बताया गया है कि ईश्वर एक है और हम सभी उनकी संतान है। फिर मानव जाति को किस बात का घंमड है।

मनुष्य को स्वयं पर कितना गर्व है। वह स्वयं को जगदीश्वर की अत्युत्तम तथा सर्वश्रेष्ठ कृति समझता है। वह अपने व्यक्तित्व को चिरस्थायी बनाना चाहता है। चिरकाल से मनुष्य यही प्रयत्न कर रहा है कि किसी प्रकार वह उस अप्राप्य अमृत को प्राप्त करे, जिसे पीकर वह अमर हो जाए, किन्तु अभी तक अमृत का पता नहीं लगा। यही कारण है कि जब मनुष्य को प्रतिदिन निकटतम आती हुई रहस्यपूर्ण मृत्यु की याद आ जाती है, तब उसका हृदय तड़पने लगता है। भविष्य में आने वाले अंत के तथा उसके अनन्तर अपने व्यक्तित्व के ही नहीं, सर्वस्व के विनष्ट होने के विचार-मात्र से ही मनुष्य का सारा शरीर सिहर उठता है। मनुष्य चाहता है कि किसी प्रकार वह इस अप्रिय सत्य को भूल जाए और उसे ही भुलाने के लिए अपनी स्मृति से, अपने मस्तिष्क से उसे निकाल बाहर करने ही के लिए, कई बार मनुष्य सुख-सागर में मग्न होने की चेष्टा करता है।

कई व्यक्तियों का हृदय तो इस विचार-मात्र से ही विकल हो उठता है कि समय के उस भयानक प्रवाह में वे स्वयं ही नहीं, किन्तु उनकी समग्र वस्तुएँ, स्मृतियाँ, स्मृति-चिह्न आदि सब कुछ बह जायेंगे, इस संसार में तब उनके सांसारिक जीवन का चिह्न मात्र भी न रहेगा और उनको याद करने वाला भी कोई न मिलेगा। ऐसे मनुष्य इस भौतिक संसार में अपनी अमिट स्मृतियाँ छोड़ जाने को विफल हो उठते हैं।

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