सौभाग्य से मिलता है सेवा का अवसर
मानवजाति ईश्वर की र्स्वश्रेष्ठ रचना है और हम उनकी संतान है
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मनुष्य को स्वयं पर कितना
गर्व है। वह स्वयं को जगदीश्वर की अत्युत्तम तथा सर्वश्रेष्ठ कृति समझता है। वह अपने
व्यक्तित्व को चिरस्थायी बनाना चाहता है। चिरकाल से मनुष्य यही प्रयत्न कर रहा है कि
किसी प्रकार वह उस अप्राप्य अमृत को प्राप्त करे, जिसे पीकर वह अमर हो जाए, किन्तु
अभी तक अमृत का पता नहीं लगा। यही कारण है कि जब मनुष्य को प्रतिदिन निकटतम आती हुई
रहस्यपूर्ण मृत्यु की याद आ जाती है, तब उसका हृदय तड़पने लगता है। भविष्य में आने
वाले अंत के तथा उसके अनन्तर अपने व्यक्तित्व के ही नहीं, सर्वस्व के विनष्ट होने के
विचार-मात्र से ही मनुष्य का सारा शरीर सिहर उठता है। मनुष्य चाहता है कि किसी प्रकार
वह इस अप्रिय सत्य को भूल जाए और उसे ही भुलाने के लिए अपनी स्मृति से, अपने मस्तिष्क
से उसे निकाल बाहर करने ही के लिए, कई बार मनुष्य सुख-सागर में मग्न होने की चेष्टा
करता है।
कई व्यक्तियों का हृदय तो
इस विचार-मात्र से ही विकल हो उठता है कि समय के उस भयानक प्रवाह में वे स्वयं ही नहीं,
किन्तु उनकी समग्र वस्तुएँ, स्मृतियाँ, स्मृति-चिह्न आदि सब कुछ बह जायेंगे, इस संसार
में तब उनके सांसारिक जीवन का चिह्न मात्र भी न रहेगा और उनको याद करने वाला भी कोई
न मिलेगा। ऐसे मनुष्य इस भौतिक संसार में अपनी अमिट स्मृतियाँ छोड़ जाने को विफल हो
उठते हैं।
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