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Showing posts from July, 2021

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सौभाग्य से मिलता है सेवा का अवसर

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नेक राह के मुसाफिर हम सुबह से रात तक अपनी व्यक्तिगत व पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझे रहते है , ऐसे में हम अपने सामाजिक कर्तव्य को भूल जाते हैं। ईश्वर ने हमें इस योग्य जरूर बनाया है कि हम थोड़े - थोड़े सहयोग से किसी जरूरतमंद की मदद कर सकें , यह सेवा का सौभाग्य हमें किसी न किसी के माध्यम से मिलता रहता है। सर्दी में ठिठुरते जरूरतमंदों के दर्द को देखकर कुछ लोग अपने दो कदम बढ़ाकर मुहिम शुरू कर देते है देखते ही देखते वह कारवाँ बन जाती है , बड़े कार्य की शुरुआत हमेशा पहले दो कदम से होती हैं , कुछ लोग इस कहावत को सही साबित कर देते है।   एक ऐसा ही मुहिम नैक राह के मुसाफिर के टीम लीडर स्वरुप जी सोलंकी सर और केशव जी सर के सहयोग से पूर्ण हुआ।   इन लोगों ने कुछ मित्रगणों का एक ग्रुप बनाया इस समूह में साथियों ने दिल खोलकर सहयोग किया है , जरूरतमंदों के लिए 100 से भी ज्यादा कम्बल खरीदना अपने आप में प्रेरणादायक व अनुकरणीय कार्य था।     " वस्त्रदान अभियान" में 10 दिसम्बर ( शनिवार ) को रात्रि 8 बजे से जोधपुर शहर के प्रमुख स्थानों पर जरूरतमंद लोगों को सर्दी से बचाव हेतु कम्बल ...

क्या आप जानते है ऋषियों और मुनियों द्वारा किये गये आविष्कार!

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  क्या आप जानते है ऋषियों और मुनियों द्वारा किये गये आविष्कार! आचार्य कणाद : - कणाद परमाणुशास्त्र के जनक हैं। आधुनिक दौर में अणु विज्ञानी जॉन डाल्टन के भी हजारों साल पहले आचार्य कणाद ने यह रहस्य उजागर किया कि द्रव्य के परमाणु होते हैं। भास्कराचार्य  :-  आधुनिक युग में धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति (पदार्थों को अपनी ओर खींचने की शक्ति) की खोज का श्रेय न्यूटन को दिया जाता है। किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण का रहस्य न्यूटन से भी कई सदियों पहले भास्कराचार्यजी ने उजागर किया। भास्कराचार्यजी ने अपने ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बारे में लिखा है कि ‘पृथ्वी आकाशीय पदार्थों को विशिष्ट शक्ति से अपनी ओर खींचती है। इस वजह से आसमानी पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है’। आचार्य चरक  : - ‘चरकसंहिता’ जैसा महत्तवपूर्ण आयुर्वेद ग्रंथ रचने वाले आचार्य चरक आयुर्वेद विशेषज्ञ व ‘त्वचा चिकित्सक’ भी बताए गए हैं। आचार्य चरक ने शरीरविज्ञान, गर्भविज्ञान, औषधि विज्ञान के बारे में गहन खोज की। आज के दौर की सबसे ज्यादा होने वाली डायबिटीज, हृदय रोग व क्षय रोग जैसी बीमारि...

मानवजाति ईश्वर की र्स्वश्रेष्ठ रचना है और हम उनकी संतान है

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  मानवजाति ईश्वर की र्स्वश्रेष्ठ रचना है और हम उनकी संतान है प्राचीन समय से हमें ज्ञान मिलता चला आ रहा है कि हम सभी संतान है उस परमात्मा के ये बात भुल नहीं जाना चाहिए। ऋषि-मुनियो द्वारा उनके दिए हुए उपदेशों में, लिखे गए ग्रंथो में और अनेक धर्म समुदायों द्वारा भी बताया गया है कि ईश्वर एक है और हम सभी उनकी संतान है। फिर मानव जाति को किस बात का घंमड है। मनुष्य को स्वयं पर कितना गर्व है। वह स्वयं को जगदीश्वर की अत्युत्तम तथा सर्वश्रेष्ठ कृति समझता है। वह अपने व्यक्तित्व को चिरस्थायी बनाना चाहता है। चिरकाल से मनुष्य यही प्रयत्न कर रहा है कि किसी प्रकार वह उस अप्राप्य अमृत को प्राप्त करे, जिसे पीकर वह अमर हो जाए, किन्तु अभी तक अमृत का पता नहीं लगा। यही कारण है कि जब मनुष्य को प्रतिदिन निकटतम आती हुई रहस्यपूर्ण मृत्यु की याद आ जाती है, तब उसका हृदय तड़पने लगता है। भविष्य में आने वाले अंत के तथा उसके अनन्तर अपने व्यक्तित्व के ही नहीं, सर्वस्व के विनष्ट होने के विचार-मात्र से ही मनुष्य का सारा शरीर सिहर उठता है। मनुष्य चाहता है कि किसी प्रकार वह इस अप्रिय सत्य को भूल जाए और उसे ही भुलान...

हरिवंशवर्णन (श्रीकृष्णकथा)

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  हरिवंशवर्णन (श्रीकृष्णकथा) राम राम दोस्तों आप सभी का हार्दिक स्वागत है…अभिनन्दन है… ब्रह्माजी ने कहा – अब मैं हरिवंश का वर्णन करूँगा, जो भगवान् कृष्ण के महात्म्य से परिपूर्ण होने के कारण श्रेष्ठतम है।             पृथिवी पर धर्म आदि की रक्षा और अधर्मादि विनाश के लिए वसुदेव तथा देवकी से कृष्ण और बलराम का प्रादुर्भाव हुआ।   जन्म के कुछ ही दिन बाद कृष्ण ने पूतना के स्तनों को दृढ़तापूर्वक पीकर उसे मृत्यु के पास पहुँचा दिया था। तद्नन्तर शकट (छकडे़) को बालक्रीडा में उलटकर सभी को विस्मित करते हुए इन्होंने यमलार्जुन-उद्धार, कालियानाग-दमन, धेनुकासुर-वध, गोवर्धन-धारण आदि अनेक लीलाएँ की और इन्द्र द्वारा पूजित होकर पृथिवी को भार से विमुक्त किया तथा अर्जुन की रक्षा के लिए प्रतिज्ञा की।             इनके द्वारा अरिष्टासुर आदि अनेक बलवान् शत्रु मारे गए। इन्होंने केशी नामक दैतय का वध किया तथा गोपों को संतुष्ट किया। उसके बाद चाणूर और मुष्टिक नामक मद्र इनके द्वारा ही पराजित हुए। ऊँ...

इसलिए जरूरी है मंदिर जाना

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राम राम दोस्तों आप सभी का हार्दिक स्वागत है…अभिनन्दन है…   बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि जब भी किसी मंदिर में दर्शन के लिए जाएं तो दर्शन करने के बाद बाहर आकर मंदिर की पेडी या ओटले पर थोड़ी देर बैठते हैं। क्या आप जानते हैं इस परंपरा का क्या कारण है.. ?   आजकल तो लोग मंदिर की पैड़ी पर बैठकर अपने घर की व्यापार की राजनीति की चर्चा करते हैं। परंतु यह प्राचीन परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई। वास्तव में मंदिर की पैड़ी पर बैठ कर के हमें एक श्लोक बोलना चाहिए। यह श्लोक आजकल के लोग भूल गए हैं। आप इस श्लोक को सुनें और आने वाली पीढ़ी को भी इसे बताएं यह श्लोक इस प्रकार है-   अनायासेन मरणं , विना दैन्येन जीवनम्। देहान्ते तव सायुज्यं , देहि मे परमेश्वरम्!   इस श्लोक का अर्थ है :- अनायासेन मरणम्...  अर्थात बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो और हम कभी भी बीमार होकर बिस्तर पर पड़े पड़े , कष्ट उठाकर मृत्यु को प्राप्त ना हो , चलते फिरते ही हमारे प्राण निकल जाएं।   बिना देन्येन जीवनम्... अर्थात परवशता का जीवन ना हो मतलब हमें कभी किसी के सहारे ना पड़े रहना पड...

भूल तो नहीं गए कही, आप भी! किसलिए इस जहां में है, उद्देश्य क्या है…

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  भूल तो नहीं गए कही, आप भी! किसलिए इस जहां में है, उद्देश्य क्या है… दोस्तों! आज में लेकर आया हुँ प्राचीन समय में हुए एक ऐसे राजा परीक्षित और बहेलिये की कहानी जो हमें बताएगी कि वह अपना वास्तविक उद्देश्य भूलकर क्यू वह इस जहां से जाना ही नहीं चाहता है। जरुर पढ़ए क्योंकि यही मेरी भी कथा है और आपकी भी। राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत पुराण सुनातें हुए जब शुकदेव जी महाराज को छह दिन बीत गए और तक्षक (सर्प) के काटने से राजा परीक्षित की मृत्यु होने का एक दिन शेष रह गया, तब भी राजा परीक्षित का शोक और मृत्यु का भय दूर नही हुआ.....!!! अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर राजा का मन क्षुब्ध हो रहा था। तब शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित को एक कथा सुनानी आरंभ की। राजन ! बहुत समय पहले की बात है, एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया। संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा पहुँचा। उसे रास्ता ढूंढते-ढूंढते रात्रि पड़ गई और भारी वर्षा पड़ने लगी। जंगल में सिंह व्याघ्र आदि बोलने लगे। वह राजा बहुत डर गया और किसी प्रकार उस भयानक जंगल में रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूंढने लगा। रात के समय ...

गरुड़पुराण की महत्ता

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  गरुड़पुराण की महत्ता   परिचय :-   गरुड़ पुराण वैष्णव सम्प्रदाय से सम्बन्धित एक महापुराण है। यह सनातन धर्म में मृत्यु के बाद सद्गति प्रदान करने वाला माना जाता है। अठारह पुराणों में गरुड़महापुराण का अपना एक विशेष महत्व है। इसके अधिष्ठातृदेव भगवान विष्णु है। गरूड़ पुराण में विष्णु-भक्ति का विस्तार से वर्णन है।   हे रूद्र। यह गरुड़ महापुराण विद्या यश सौंदर्य , लक्ष्मी , विजय , आरोग्य आदि का कारक है। जो   मनुष्य इसका पाठ करता है , या सुनता है ,   वह सब कुछ जान जाता है। और अंत में उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है।     जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर इस महापुराण का पाठ करता है ,   सुनता है अथवा सुनाता है , जो इसको लिखता है , या पुस्तक के ही रूप में इसे अपने पास रखता है।   वह यदि धर्मार्थी है तो उसे धर्म की प्राप्ति होती है , यदि वह अर्थ का अभिलाषी है तो उसे अर्थ प्राप्त करता है।     जिस मनुष्य के हाथ में यह गरुड़ महापुराण विद्यमान है ,   उसके हाथ में ही नीतियों का कोर्स है। जो प्राणी इस पुराण का पाठ करता है। ...

योग जगत में ऋषी-मुनि के 8 नियम

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योग जगत में ऋषी-मुनि के 8 नियम   "यम" के परिलक्षण, सिद्धि एवं फल   परिचय :-   योगशास्त्रों में योग और ध्यान का निरूपण करते हुए अपने अनुभवों के आधार पर ज्ञानियों ने प्रथम योग साधन में चार द्वार बताए है जो ईश्वर की अनुग्रह के बिना किसी भी जीव को प्राप्त होने अतिकठिन हैं। जिसमें :-   ·         प्रथम तो स्त्रीआदिकविषयों का परित्याग होना ·         द्वितीय सर्व प्रकार से योग साधन की सामग्री की अनुकूलता होना ·         तीसरे योगविद्या के जानने वाले गुरु का समागम होना ·         चौथा ईश्वर का आराधन करना यह प्रमुख मार्ग है।   यह चार योग के ऋषि - मुनि लोकों ने मुख्य द्वार बताए हैं क्योंकि इनके बिना कड़ोरो जन्मों में भी योग की सिद्धि का सफल होना संभव नहीं है।   तथा योग के आठ अंग साधक पुरुषों को समझने चाहिए। जिनके साधन करने से यह जीव कैवल्य मोक्ष पद को प्राप्त होता है।   यह योग के आठ अंग योगी लोकों ...