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Showing posts from June, 2021

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सौभाग्य से मिलता है सेवा का अवसर

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नेक राह के मुसाफिर हम सुबह से रात तक अपनी व्यक्तिगत व पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझे रहते है , ऐसे में हम अपने सामाजिक कर्तव्य को भूल जाते हैं। ईश्वर ने हमें इस योग्य जरूर बनाया है कि हम थोड़े - थोड़े सहयोग से किसी जरूरतमंद की मदद कर सकें , यह सेवा का सौभाग्य हमें किसी न किसी के माध्यम से मिलता रहता है। सर्दी में ठिठुरते जरूरतमंदों के दर्द को देखकर कुछ लोग अपने दो कदम बढ़ाकर मुहिम शुरू कर देते है देखते ही देखते वह कारवाँ बन जाती है , बड़े कार्य की शुरुआत हमेशा पहले दो कदम से होती हैं , कुछ लोग इस कहावत को सही साबित कर देते है।   एक ऐसा ही मुहिम नैक राह के मुसाफिर के टीम लीडर स्वरुप जी सोलंकी सर और केशव जी सर के सहयोग से पूर्ण हुआ।   इन लोगों ने कुछ मित्रगणों का एक ग्रुप बनाया इस समूह में साथियों ने दिल खोलकर सहयोग किया है , जरूरतमंदों के लिए 100 से भी ज्यादा कम्बल खरीदना अपने आप में प्रेरणादायक व अनुकरणीय कार्य था।     " वस्त्रदान अभियान" में 10 दिसम्बर ( शनिवार ) को रात्रि 8 बजे से जोधपुर शहर के प्रमुख स्थानों पर जरूरतमंद लोगों को सर्दी से बचाव हेतु कम्बल ...

हरि और ओम का रहस्य

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हरि और ओम का रहस्य   परिचय : लाखों हिंदू दिन में कई कई बार तीन -चार शब्दों का प्रयोग करते हैं जिनमें है - हरि , हरे, हरि ओम, हर, हरे कृष्ण , हर हर। शायद ही किसी ने सोचा होगा कि अर्थ क्या है इसका। क्यों बोल रहे हैं । यह तो समझ में आता है कि यह संबोध ना त्मक शब्द है। हिंदी संस्कृत में है परमात्मा ! है ईश्वर ! जब हम हरे राम हरे कृष्ण कहते हैं तो इस हरे शब्द का क्या अर्थ है। या हरि ओम कहते हैं तो इस ओम के साथ हरि का क्या अर्थ है। यह समझने की बात है । हरि शब्द का अर्थ: हरि शब्द का कई अर्थ है । संस्कृत में भी कई अर्थ है । हिंदी में भी कई अर्थ है । हिंदी में तो कई अद्भुत प्रकार के अर्थ होते हैं। हरि विष्णु भी है । शिव भी है । बंदर भी है। घोड़ा भी है । शेर भी है । वायू भी है । मेंढक भी है । किरण भी है। कितने अर्थ है - लेकिन सबसे महत्वपूर्ण अर्थ है - वह हरा है। हरा रंग हरियाली का प्रतीक है , हरियाली सुख समृद्धि का प्रतीक है। हम जब हरि ओम कहते हैं , या हरे राम कहते हैं , हरी कृष्ण कहते हैं , तो हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हमारा जीवन हरा-भरा बना दो प्रभु । ...

पुनर्जन्म का रहस्य

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 पुनर्जन्म का रहस्य प्रश्न :- पुनर्जन्म किसे कहते हैं ? उत्तर :- आत्मा और इन्द्रियों का शरीर के साथ बार बार सम्बन्ध टूटने और बनने को पुनर्जन्म या प्रेत्याभाव कहते हैं । प्रश्न :- प्रेत किसे कहते हैं ? उत्तर :- जब आत्मा और इन्द्रियों का शरीर से सम्बन्ध टूट जाता है तो जो बचा हुआ शरीर है उसे शव या प्रेत कहा जाता है । प्रश्न :- भूत किसे कहते हैं ? उत्तर :- जो व्यक्ति मृत हो जाता है वह क्योंकि अब वर्तमान काल में नहीं है और भूतकाल में चला गया है इसी कारण वह भूत कहलाता है । प्रश्न :- पुनर्जन्म को कैसे समझा जा सकता है ? उत्तर :- पुनर्जन्म को समझने के लिये आपको पहले जन्म और मृत्यु के बारे मे समझना पड़ेगा । और जन्म मृत्यु को समझने से पहले आपको शरीर को समझना पड़ेगा । प्रश्न :- शरीर के बारे में समझाएँ । उत्तर :- शरीर दो प्रकार का होता है :- (१) सूक्ष्म शरीर ( मन, बुद्धि, अहंकार, ५ ज्ञानेन्द्रियाँ ) (२) स्थूल शरीर ( ५ कर्मेन्द्रियाँ = नासिका, त्वचा, कर्ण आदि बाहरी शरीर ) और इस शरीर के द्वारा आत्मा कर्मों को करता है । प्रश्न :- जन्म किसे कहते हैं ? उत्तर :- आत्मा का सूक्ष्म शरीर को लेकर स्थूल शर...

जीवमात्र के उद्धार का सार : योग और ध्यान

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जीवमात्र के उद्धार का सार : योग और ध्यान मानव कल्याण और जीवोद्धार के लिए प्राचीनतम ऋषि-मुनियों और आचार्यो द्वारा बताई गई पुरे जीवनकाल का सार था-ध्यान, ज्ञान और योग साधना। आप सभी महाशय को इस बात का पता है कि योगविद्या जीवात्मा की उन्नति का एक मुख्य साधन रहा है। वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहासादि ग्रंथों में सभी जगह योग का प्रतिपादन हुआ है। भारत के अलावा चीन, तिब्बत, जापान, अमेरिका आदि देशों में तथा वेदांत, बौद्ध, जैन, शैव, वैष्णवादि में योग का आदर हुआ है। महादेव, मत्स्येन्द्र, गोरक्ष, पतंजलि, वसिष्ठ, वामदेवादिक बडे-बडे देवता ऋषि-मुनियों ने योग का साधन किया है। इतिहासों में प्रसिद्ध है और जो-जो मनुष्य शक्ति से विलक्षण उत्कृष्ट गुण ऋषि-मुनियों में सुनने में आते हैं ये सभी योगविद्या के प्रभाव से ही उनको प्राप्त हुये थे। वर्तमान में हम जिसे चमत्कार समझ कर असंभव बतलाते हैं ये इस योगविद्या के प्रतिपादक पातंजल, गोरक्षसंहिता, योगियाज्ञवल्क्यसंहिता, शिवसंहिता, योगबीज, अनेक ग्रंथ विद्यमान हैं जिनमें भिन्न भिन्न प्रकरणों में योग के साधनों से किया है। योगरूपी निद्रा को ग्रहण करके जो शेषनाग की शय्या पर ...

जाने मृत्यु औऱ आत्मा से जुड़े गहरे ओर गुप्त रहस्य जो स्वयं यमराज ने बताये थे नचिकेता को?

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  जाने मृत्यु औऱ आत्मा से जुड़े गहरे ओर गुप्त रहस्य जो स्वयं यमराज ने बताये थे नचिकेता को ? हमारे हिन्दू धर्म में विश्वास है की किसी भी मनुष्य की मृत्यु के पश्चात उस मनुष्य की आत्मा को यमदूतों दवारा यमलोग ले जाया जाता है । जहाँ उस आत्मा को मृत्यु के देव व सूर्य पुत्र यमराज का सामना करना पड़ता है , तथा उसके अच्छे या बुरे कर्मो के हिसाब से वह स्वर्ग अथवा नर्क पाता है। पुराणिक कथाओ में दो ऐसी कथाएँ मिलती है जिसमे बताया गया है की स्वयं मृत्युदेव यमराज को भी साधारण मनुष्य के आगे मजबूर होना पड़ा था। पहली कथा के अनुसार यमराज को पतिव्रता सवित्री के जिद के आगे उसके मृत पति सत्यवान को जीवित करना पड़ा था। तथा दूसरी कथा एक बालक से संबंधित है , जिसमे बालक नचिकेता के हठ के आगे यमराज ने उसे मृत्यु से संबंधित गूढ़ रहस्य बताये थे। आइये जानते है आखिर क्यों बालक नचिकेता को यमराज से मृत्यु के रहस्यों को जानने की जरूरत पड़ी और क्या थे ये रहस्य ?   नचिकेता वाजश्रवस ऋषि के पुत्र थे , एक बार वाजश्रवस ऋषि ने अपने आश्रम में विश्वजीत नामक यज्ञ करवाया। इस यज्ञ के सम्पन्न होने के पश्चात अब दान-दक्...

विधि का विधान...

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विधि का विधान.... श्री राम का विवाह और राज्याभिषेक, दोनों शुभ मुहूर्त देख कर किए गए थे; फिर भी न वैवाहिक जीवन सुखमय हुआ, न ही राज्याभिषेक... और जब मुनि वशिष्ठ से इसका उत्तर मांगा गया, तो उन्होंने साफ कह दिया  "सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेहूं मुनिनाथ। हानि लाभ, जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ।।" अर्थात - जो विधि ने निर्धारित किया है, वही होकर रहेगा! न प्रभु राम के जीवन को बदला जा सका, न भगवान कृष्ण के! औऱ न ही महादेव शिव जी माता सती की मृत्यु को टाल सके, जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आवाहन करता है! न गुरु अर्जुन देव जी और न ही गुरु तेग बहादुर साहब जी और दश्मेश पिता गुरू गोबिन्द सिंह जी, अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे! रामकृष्ण परमहंस भी अपने कैंसर को न टाल सके! न रावण अपने जीवन को बदल पाया, न ही कंस, जबकि दोनों के पास समस्त शक्तियाँ थी! एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु गरुड़ पर बैठ कर कैलाश पर्वत पर गए। द्वार पर गरुड़ को छोड़ कर श्री हरि खुद भगवान शिव से मिलने अंदर चले गए। तब कैलाश की प्राकृतिक शोभा को देख कर गरुड़ मंत्रमुग्ध थे कि तभी उ...

त्रिगुणमयी माया क्यु मनुष्य को जीव मुक्त नहीं होने देती।

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त्रिगुणमयी माया क्यु मनुष्य को जीव मुक्त नहीं होने देती। माया त्रिगुणमयी है। सतोगुण , रजोगुण और तमोगुण। प्रत्येक जीव के चौबीस घंटे का कर्मफल , माया तीन भागों में बांट कर अलग अलग संस्कार की खजानों में जमा कर देती है। जैसे :- भजन , कीर्तन , ध्यान ,  स्मरण , स्वाध्ययन , योग , जप , तप , व्रत , यम , नियम , सत्संग एवं संयम इत्यादि में जो समय व्यतीत होता है , उनके कर्मफल सतोगुण के खजाने में जमा होते हैं। दूसरा खान , पान , ऐश , आराम , खेती , गृहस्थी , रोजगार , व्यापार , गप्प - शप्प एवं राजनैतिक क्षेत्र का कार्य इत्यादि में जो समय व्यतीत होता है , उनके कर्मफल रजोगुण के खजाने में जमा होते हैं। तीसरा परनिन्दा , ( शिकायत ), गाली ग्लौज , बुरे व्यवहार की बातचीत , चोरी , डकैती चुगलखोरी , ताड़ी , दारू , शराब पीना बासी तथा उच्छिष्ट भोजन एवं शयनावस्था ( निद्रा ) में जितने भी समय खर्च होते हैं , सभी के कर्मफल तमोगुण के खजाने में संचित होते हैं। सतोगुण अधिक होने पर देवयोनि की प्राप्ति होती है। रजोगुण अधिक होने पर मनुष्य योनि मिलता है। तथा तमोगण संस्कार अधिक होने पर पशु , पक्षी , कोड़े मकोड़े इत...

ध्यान (मैडिटेशन) क्यों करें? कितना करें? समूह में या अकेले??

सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक आईस्टांईन नें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कहा था, "एक अणु के विधटन से लगातार असंख्य अणुओं का विधटन होता है, इसी को हम अणु विस्फोट कहते है।"  यही सूत्र हमारे ऋषि, मुनियों ने हमें हजारों साल पहले दिया था। मस्तिष्क की शक्ति को ध्यान की सहायता से कई गुना बढ़ाया जा सकता है और जीवन के लक्ष्य प्राप्त किए जा सकते हैं। अपार असीम शक्तियों की प्राप्ति की जा सकती है।  40 दिनों तक ध्यान करते रहने के बाद ध्यान ‍की शक्ति का अहसास होना शुरू हो जाता है। व्यक्ति स्वयं को ऊर्जावान और हमेशा तरोताजा महसूस करता है। मस्तिष्क अच्छे तरीके से सक्रिय होकर सकारात्मक सोच का निर्माण करता है। ध्यान से हमे अपने जीवन का उद्देश्य समझने में सहायता मिलती है। इसी तरह किसी कार्य का उद्देश्य एवं महत्ता का सही ज्ञान हो पाता है।  जब 100 लोग एक साथ एक तरह की साधना करते हैं तो उत्पन्न लहरें 5 कि.मी.तक फैलती है और नकारात्मकता नष्ट कर सकारात्मकता का निर्माण करती है। आज पृथ्वी पर केवल 4% लोग ही ध्यान करते हैं, लेकिन बचे 96% लोंगो को इसका पॉजिटिव इफेक्ट होता है। अगर हम भी लगातार 90 दिनो तक ध्यान करें ...

ध्यान : अंतर्द्वंद्व से ब्रह्म तक का सफर

   ध्यान :  अंतर्द्वंद्व  से ब्रह्म तक का सफर ध्यान में अगर आपका  मन  नहीं है  लग रहा है  तो वह ध्यान नहीं है ….  हर ध्यान में आनंद आना चाहिए। अगर ध्यान में एक बार की समाधि  में  बैठने के बाद मन नहीं लग रहा है तो ऋषि - मुनियों ने  7  पायदान  बताएँ है। यह ईश्वर  तक पहुँचने का मार्ग  भी  है। आप चाहे तो जल्दी से भाग के  उस सीढ़ी के द्वारा  चढ़ जाओ या धीरे - धीरे उस मार्ग पर जाओ जो आपको  सत्यता  के दर्शन कराता है।  आ पके ध्यान में प्रभु को  लाता है और आपके लक्ष्य तक पहुँचने का सही मार्ग बताता है। 1.  दास्य भाव  :   आपका  कोई  नाम नहीं। आपकी कोई पहचान नहीं ।  आपका कोई देश नहीं ,  गाँव नहीं। आप कुछ नहीं। आप  बस ईश्वर  के दास हो और कुछ नहीं। अब  आपने स्वयं  को दास  ईश्वर  का मान ही लिया है तो दास की तरह भाव लाना सीखो।  मनुष्य की समस्या क्या हैं वह किसी को मानता नहीं है, क्योंकि वह अहम् भाव में जीता है। कोई भी समस्...

सम्मान करना सीखे

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         आपके घर में जब तक कोई पुण्य शाली व्यक्ति रहता है, तब तक आपके घर में कोई नुकसान नहीं कर सकता.......      जब तक विभीषणजी लंका में रहते थे , तब तक रावण ने कितना भी पाप किया, परंतु विभीषणजी के पुण्य के कारण रावण सुखी रहा।      परंतु जब विभीषणजी जैसे भगवत  वत्सल भक्त को लात मारी और  लंका से निकल जाने के लिए कहा, तब से रावण का विनाश होना शुरू हो गया।      अंत में रावण की सोने  की  लंका का  दहन हो गया और रावण के पीछे कोई रोने वाला भी नहीं बचा।      ठीक इसी तरह हस्तिनापुर में जब तक विदुरजी जैसे भक्त रहते थे , तब तक कौरवों को सुख ही सुख मिला।      परंतु जैसे ही कौरवों ने विदुरजी का अपमान करके राज्यसभा से चले जाने के लिए कहा और विदुर जी का अपमान किया, तब भगवान श्री कृष्ण जी ने विदुरजी से कहा कि काका आप अभी तीर्थ यात्रा के लिए प्रस्थान करिए और भगवान के तीर्थ स्थानों पर यात्रा करिए।      और भगवान श्री कृष्णजी ने विदुरजी को तीर्थ यात्रा के लिए भेज दि...

ध्यान : शान्ति अंर्तमन की

ध्यान : शान्ति अंर्तमन की ध्यान में हमारी सबसे बड़ी समस्या रहती है- ध्यान के भटकाव की। मनुष्य सोचता बहुत है और जब वह ध्यान करने लगता है तो हजारों ख्याल एक साथ आने भी लगते हैं । वैसे इसे रोका नहीं जा सकता। हमारे दिमाग में एक नस है जो सोचने का कार्य करती है। हम उसे रोक नहीं सकते इसलिए ख्याल आने को भी रोक नहीं सकते। हमें कोई विचार न आए ये विचार करके हम ध्यान करने लगते हैं। सारे विचार को त्याग कर एक विचार दिमाग में रख लेना भी तो एक विचार है। अगर रोका जाए तो ब्रेन हेमरेज हो जाएगा। हाँ, अच्छा रहेगा हम विचारशून्य हो जाए। अभ्यास से यह संभव है। प्राचीन समय में हमारे ऋषि-मुनियों के आश्रम में और वर्तमान में ध्यान केन्द्रों में आज भी अलग-अलग तरीके से ध्यान कराए जाते हैं। कुछ लोग शिविर भी लगा रहे हैं। चाहे कोई भी मार्ग से चलें हमें ध्यान करना सीखना है और यह आना चाहिए। हमारे ऋषि-मुनियों ने एकाग्रचित ध्यान करने के 5 मार्ग बताएँ हैं, जो सरल और कारगर भी है। ध्यान की कुछ विद्या है। जिस तरह आप अपने शरीर के बाकी हिस्सों पर नियंत्रण करना सीख गए हैं उसी प्रकार ध्यान पर भी नियंत्रण करना संभव है। 1. ...