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Showing posts from September, 2021

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सौभाग्य से मिलता है सेवा का अवसर

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नेक राह के मुसाफिर हम सुबह से रात तक अपनी व्यक्तिगत व पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझे रहते है , ऐसे में हम अपने सामाजिक कर्तव्य को भूल जाते हैं। ईश्वर ने हमें इस योग्य जरूर बनाया है कि हम थोड़े - थोड़े सहयोग से किसी जरूरतमंद की मदद कर सकें , यह सेवा का सौभाग्य हमें किसी न किसी के माध्यम से मिलता रहता है। सर्दी में ठिठुरते जरूरतमंदों के दर्द को देखकर कुछ लोग अपने दो कदम बढ़ाकर मुहिम शुरू कर देते है देखते ही देखते वह कारवाँ बन जाती है , बड़े कार्य की शुरुआत हमेशा पहले दो कदम से होती हैं , कुछ लोग इस कहावत को सही साबित कर देते है।   एक ऐसा ही मुहिम नैक राह के मुसाफिर के टीम लीडर स्वरुप जी सोलंकी सर और केशव जी सर के सहयोग से पूर्ण हुआ।   इन लोगों ने कुछ मित्रगणों का एक ग्रुप बनाया इस समूह में साथियों ने दिल खोलकर सहयोग किया है , जरूरतमंदों के लिए 100 से भी ज्यादा कम्बल खरीदना अपने आप में प्रेरणादायक व अनुकरणीय कार्य था।     " वस्त्रदान अभियान" में 10 दिसम्बर ( शनिवार ) को रात्रि 8 बजे से जोधपुर शहर के प्रमुख स्थानों पर जरूरतमंद लोगों को सर्दी से बचाव हेतु कम्बल ...

प्रणाम का महत्व

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                             प्रणाम का महत्व   महाभारत का युद्ध चल रहा था- एक दिन दुर्योधन के व्यंग्य से आहत होकर "भीष्म पितामह" घोषणा कर देते हैं कि-   " मैं कल पांडवों का वध कर दूँगा"   उनकी घोषणा का पता चलते ही पांडवों के शिविर में बेचैनी बढ़ गई-   भीष्म की क्षमताओं के बारे में सभी को पता था इसलिए सभी किसी अनिष्ट की आशंका से परेशान हो गए |   तब - श्री कृष्ण ने द्रौपदी से कहा अभी मेरे साथ चलो -   श्रीकृष्ण द्रौपदी को लेकर सीधे भीष्म पितामह के शिविर में पहुँच गए -   शिविर के बाहर खड़े होकर उन्होंने द्रोपदी से कहा कि - अन्दर जाकर पितामह को प्रणाम करो -   द्रौपदी ने अन्दर जाकर पितामह भीष्म को प्रणाम किया तो उन्होंने-   " अखंड सौभाग्यवती भव" का आशीर्वाद दे दिया , फिर उन्होंने द्रोपदी से पूछा कि !!   " वत्स , तुम इतनी रात में अकेली यहाँ कैसे आई हो , क्या तुमको श्रीकृष्...

श्रीकृष्ण को जिन सोलह कलाओं से परिपूर्ण कहा जाता है, वे कलाएं कौन सी हैं?

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  श्रीकृष्ण को जिन सोलह कलाओं से परिपूर्ण कहा जाता है, वे कलाएं कौन सी हैं? प्रभु श्रीराम 12 कलाओं के ज्ञाता थे तो भगवान श्रीकृष्ण सभी 16 कलाओं के ज्ञाता हैं। चंद्रमा की सोलह कलाएं होती हैं। और ब्रह्म यानि की स्वयं ईश्वर 16 कलाओं से युक्त होते हैं और फिर भगवान शिव जी 64 कलाओं में पारंगत हैं और उन्हें 64 कलाओं का पूर्ण ज्ञान है ।। सामान्यत मनुष्य के पास 5 कला तक होती है और अगर उसे उसका ज्ञान और भान हो तब ठीक है ।। यहां पर भगवान श्रीकृष्ण जी के 16 कलाओं के बारे में जानकारी दी गई है ।। भगवान श्रीकृष्ण सोलह कलाओं से युक्त थे। श्रीकृष्ण जी में ही ये सारी खूबियां समाविष्ट थी। श्री कृष्ण जिन सोलह कलाओं को धारण करते थे उनका संक्षिप्त विवरण यह है। भगवान कृष्ण की ये वो 16 कलायें हैं, जो हर किसी व्यक्ति में कम या ज्यादा होती हैं। कला 1- श्री संपदा श्री कला से संपन्न व्यक्ति के पास लक्ष्मी का स्थायी निवास होता है। ऐसा व्यक्ति आत्मिक रूप से धनवान होता है। ऐसे व्यक्ति के पास से कोई खाली हाथ वापस नहीं आता। इस कला से संपन्न व्यक्ति ऐश्वर्यपूर्ण जीवनयापन करता है। कला 2- भू संपदा जिसके भीतर पृथ्वी प...

निमित्त होने का घमंड कैसा ??

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निमित्त होने का घमंड कैसा ?? आज हमने  भोजन करवाया। आज हमने ये बांटा, आज हमने वो दान किया एक लकड़हारा रात-दिन लकड़ियां काटता, मगर कठोर परिश्रम के बावजूद उसे आधा पेट भोजन ही मिल पाता था। एक दिन उसकी मुलाकात एक साधु से हुई। लकड़हारे ने साधु से कहा कि जब भी आपकी प्रभु से मुलाकात हो जाए, मेरी एक फरियाद उनके सामने रखना और मेरे कष्ट का कारण पूंछना। कुछ दिनों बाद उसे वह साधु फिर मिला।  लकड़हारे ने उसे अपनी फरियाद की याद दिलाई तो साधु ने कहा कि- "प्रभु ने बताया हैं कि लकड़हारे की आयु 60 वर्ष हैं और उसके भाग्य में पूरे जीवन के लिए सिर्फ पाँच बोरी अनाज है। इसलिए प्रभु उसे थोड़ा अनाज ही देते हैं ताकि वह 60 वर्ष तक जीवित रह सके। समय बीता। साधु उस लकड़हारे को फिर मिला  तो लकड़हारे ने कहा "ऋषिवर...!! अब जब भी आपकी प्रभु से बात हो तो मेरी यह फरियाद उन तक पहुँचा देना कि वह मेरे जीवन का सारा अनाज एक साथ दे दें, ताकि कम से कम एक दिन तो मैं भरपेट भोजन कर सकूं।" अगले दिन लकड़हारे के घर पॉच बोरी अनाज पहुँच गया।  लकड़हारे ने प्रभु ने को धन्यवाद दिया कि उसकी फरियाद कबूल कर उसे उसका सारा हिस्सा भेज दि...

महर्षि दधीचि कौन थे और उनकी शिक्षाएँ क्या है की सम्पूर्ण जानकारी

महर्षि दधीचि कौन थे और उनकी शिक्षाएँ क्या है की सम्पूर्ण जानकारी          प्रजापति कर्दमकी कन्या शान्ति से अथर्वा ऋषि का विवाह हुआ था। उससे उन्हें एक परम तेजस्वी पुत्र हुआ। जिसका नाम उन्होंने दधीचि रखा। दधीचि जन्म से ही विरक्त एवं परम शिवभक्त थे।        जब प्रजापति दक्ष ने अपने यज्ञ में शंकरजी का भाग नहीं रखा तो महर्षि दधीचि ने दक्ष को बहुत समझाया। दक्ष ने उनकी बात नहीं मानी, इससे यज्ञमण्डप से उठकर वे अपने आश्रम पर चले गये। अन्त में सती के देह-त्याग के बाद वीरभद्र ने उस यज्ञ का विध्वंस कर दिया।               महर्षि दधीचि बडी कठोर तपस्या कर रहे थे। इन्द्र को लगा कि ये मेरा इन्द्रपद छीनना चाहते हैं, इसलिये उन्होंने कामदेव को और अलम्बुषा नाम की एक सुन्दर अप्सरा को उनकी तपस्या में विघ्न डालने को भेजा। अलम्बुषा महर्षि दधीचि के आश्रम में जाकर गाती हुई नाचने लगी, कामदेव ने अपने सम्मोहन बाण चलाये। किंतु महर्षिका ध्यान नहीं टूटा। उन्होंने आँखें खोली ही नहीं।   ...