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सौभाग्य से मिलता है सेवा का अवसर

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नेक राह के मुसाफिर हम सुबह से रात तक अपनी व्यक्तिगत व पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझे रहते है , ऐसे में हम अपने सामाजिक कर्तव्य को भूल जाते हैं। ईश्वर ने हमें इस योग्य जरूर बनाया है कि हम थोड़े - थोड़े सहयोग से किसी जरूरतमंद की मदद कर सकें , यह सेवा का सौभाग्य हमें किसी न किसी के माध्यम से मिलता रहता है। सर्दी में ठिठुरते जरूरतमंदों के दर्द को देखकर कुछ लोग अपने दो कदम बढ़ाकर मुहिम शुरू कर देते है देखते ही देखते वह कारवाँ बन जाती है , बड़े कार्य की शुरुआत हमेशा पहले दो कदम से होती हैं , कुछ लोग इस कहावत को सही साबित कर देते है।   एक ऐसा ही मुहिम नैक राह के मुसाफिर के टीम लीडर स्वरुप जी सोलंकी सर और केशव जी सर के सहयोग से पूर्ण हुआ।   इन लोगों ने कुछ मित्रगणों का एक ग्रुप बनाया इस समूह में साथियों ने दिल खोलकर सहयोग किया है , जरूरतमंदों के लिए 100 से भी ज्यादा कम्बल खरीदना अपने आप में प्रेरणादायक व अनुकरणीय कार्य था।     " वस्त्रदान अभियान" में 10 दिसम्बर ( शनिवार ) को रात्रि 8 बजे से जोधपुर शहर के प्रमुख स्थानों पर जरूरतमंद लोगों को सर्दी से बचाव हेतु कम्बल ...

कृष्ण हमारे लिए हमेशा सही कार्य करते हैं


जीने की पद्धति में श्री 
कृष्ण भगवान का साथ हो, 

फिर क्या बात है जीवन की नैया ही पार हो...


Shri Krishna



एक बार नारद जी ने भगवान से प्रश्न किया कि प्रभु आपके भक्त गरीब क्यों होते हैं? 

तो भगवान बोले - "नारद जी ! मेरी  कृपा को समझना बड़ा कठिन है।" इतना कहकर भगवान नारद के साथ साधु भेष में पृथ्वी पर पधारे और एक सेठ जी के घर भिक्षा मांगने के लिए दरवाजा खटखटाने लगे। सेठ जी बिगड़ते हुए दरवाजे की तरफ आए और देखा तो दो साधु खड़े हैं।

भगवान बोले - "भैया ! बड़े जोरों की भूख लगी है। थोड़ा सा खाना मिल जाए।"

सेठ जी बिगड़कर बोले "तुम दोनों को शर्म नहीं आती। तुम्हारे बाप का माल है ? कर्म करके खाने में शर्म आती है, जाओ-जाओ किसी होटल में खाना मांगना।"

नारद जी बोले - "देखा प्रभु ! यह आपके भक्तों और आपका निरादर करने वाला सुखी प्राणी है। इसको अभी शाप दीजिये।" नारद जी की बात सुनते ही भगवान ने उस सेठ को अधिक धन सम्पत्ति बढ़ाने वाला वरदान दे दिया।

इसके बाद भगवान नारद जी को लेकर एक बुढ़िया मैया के घर में गए। जिसकी एक छोटी सी झोपड़ी थी, जिसमें एक गाय के अलावा और कुछ भी नहीं था। जैसे ही भगवान ने भिक्षा के लिए आवाज लगायी, बुढ़िया मैया बड़ी खुशी के साथ बाहर आयी। दोनों सन्तों को आसन देकर बिठाया और उनके पीने के लिए दुध लेकर आयीं और बोली - "प्रभु ! मेरे पास और कुछ नहीं है, इसे ही स्वीकार कीजिये।"

भगवान ने बड़े प्रेम से स्वीकार किया। तब नारद जी ने भगवान से कहा - "प्रभु ! आपके भक्तों की इस संसार में देखो कैसी दुर्दशा है, मेरे पास तो देखी नहीं जाती। यह बेचारी बुढ़िया मैया आपका भजन करती है और अतिथि सत्कार भी करती है। आप इसको कोई अच्छा सा आशीर्वाद दीजिए।"

भगवान ने थोड़ा सोचकर उसकी गाय को मरने का अभिशाप दे डाला।"  यह सुनकर नारद जी बिगड़ गए और कहा - "प्रभु जी ! यह आपने क्या किया ?"

भगवान बोले - "यह बुढ़िया मैया मेरा बहुत भजन करती है। कुछ दिनों में इसकी मृत्यु हो जाएगी और मरते समय इसको गाय की चिन्ता सताएगी कि मेरे मरने के बाद मेरी गाय को कोई कसाई न ले जाकर काट दे, मेरे मरने के बाद इसको कौन देखेगा ? 

तब इस मैया को मरते समय मेरा स्मरण न होकर बस गाय की चिन्ता रहेगी और वह मेरे धाम को न जाकर गाय की योनि में चली जाएगी।" 

उधर सेठ को धन बढ़ाने वाला वरदान दिया कि मरने वक़्त धन तथा तिजोरी का ध्यान करेगा और वह तिजोरी के नीचे साँप बनेगा।

प्रकृति का नियम है जिस चीज मे अति लगाव रहेगा यह जीव मरने के बाद बही जनम लेता है ओर बहुत दुख भोगता है 

अतः अपना चिंतन प्रभू की तरफ अधिक रखे !


🙏 हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे 

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे 🙏

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