सौभाग्य से मिलता है सेवा का अवसर
महर्षि दधीचि कौन थे और उनकी शिक्षाएँ क्या है की सम्पूर्ण जानकारी
प्रजापति कर्दमकी कन्या शान्ति से अथर्वा ऋषि
का विवाह हुआ था। उससे उन्हें एक परम तेजस्वी पुत्र हुआ। जिसका नाम उन्होंने दधीचि
रखा। दधीचि जन्म से ही विरक्त एवं परम शिवभक्त थे।
जब प्रजापति दक्ष ने अपने यज्ञ में शंकरजी का
भाग नहीं रखा तो महर्षि दधीचि ने दक्ष को बहुत समझाया। दक्ष ने उनकी बात नहीं मानी,
इससे यज्ञमण्डप से उठकर वे अपने आश्रम पर चले गये। अन्त में सती के देह-त्याग के बाद
वीरभद्र ने उस यज्ञ का विध्वंस कर दिया।
महर्षि दधीचि बडी कठोर तपस्या कर रहे थे। इन्द्र
को लगा कि ये मेरा इन्द्रपद छीनना चाहते हैं, इसलिये उन्होंने कामदेव को और अलम्बुषा
नाम की एक सुन्दर अप्सरा को उनकी तपस्या में विघ्न डालने को भेजा। अलम्बुषा महर्षि
दधीचि के आश्रम में जाकर गाती हुई नाचने लगी, कामदेव ने अपने सम्मोहन बाण चलाये। किंतु
महर्षिका ध्यान नहीं टूटा। उन्होंने आँखें खोली ही नहीं।
कामदेव और अप्सरा के निराश होकर लौट जाने पर
इन्द्रने महर्षि को मार देने का निश्चय किया। देवराज इन्द्र की आज्ञा से दूसरे देवता
भी महर्षि के आश्रम पर गये। किंतु महर्षि दधीचि जिन-जिन शस्त्रों से वे महर्षि को मारते
थे, वे शस्त्र महर्षि के तेज से बीच में ही गिर पड़ते थे। सभी देवताओं के अस्त्र-शस्त्र
व्यर्थ हो गये और देवताओं के साथ देवराज इन्द्र हारकर लौट गये।
जिन महर्षि दधीचि को इन्द्र ने मारना चाहा था,
जब दैत्यों के नायक वृत्रासुर ने देवताओं को हराकर स्वर्ग से निकाल दिया तब देवताओं
के साथ इन्द्र उन्हीं महर्षि दधीचि की शरण में गये। बात यह थी कि वृत्रासुर ने देवताओं
के सभी अस्त्र-शस्त्र निगल लिये थे। महर्षि दधीचि की हड्डियों से बने वज्र को छोड़कर
दूसरे किसी उपाय से वह मारा नहीं जा सकता था। महर्षि दधीचि को देवता मार तो सकते नहीं
थे, वे उनसे उनकी हड्डियाँ माँगने गये थे।
देवताओंकी याचना सुनकर महर्षि ने कहा- 'शरीर
तो एक-न-एक दिन नष्ट ही होगा। इससे उत्तम और क्या बात होगी कि यह नश्वर देह किसी के
उपकार में लग जाय। मैं शरीर का त्याग करता हूँ। आप लोग मेरी हड्डियाँ लेकर अपना कार्य
सिद्ध करें।'
महर्षि दधीचि ने समाधि लगाकर शरीर छोड़ दिया।
जंगली गायों ने चाट-चाटकर उनके देह में केवल हड्डियाँ रहने दी। उन्हीं हड्डियों से
विश्वकर्मा ने वह वज्र बनाया, जिस वज्रके द्वारा वृत्रासुर मारा गया।
महर्षि दधीचि की
शिक्षा
इस शरीर को नश्वर
जानो।
अन्त नष्ट होगा
ध्रुव मानो।
इससे कभी मोह नहिं
करना।
पाप-पंथ में पैर
न धरना।
यह क्षण क्षण में
बदल रहा है।
जो कल था वह आज
कहाँ है।
शिशु से बालक,
तरुण हुआ जो।
वृद्ध हुआ फिर
नष्ट हुआ जो।
सदुपयोग इसका करना
है।
इसे न भोगों से
भरना है।
अस्थिमात्र भी
अपना देकर।
परहित करना मरण-वरण
कर
इससे जितना परहित
होगा।
उतना ही अपना हित
होगा।
वही सुकृत बस,
साथ जायगा।
वही कष्ट में काम
आयगा।
करो धर्म जो भी
बन जाता।
धर्म दुःखसे सदा
बचाता
श्रेष्ठ धर्म है
पर-उपकार।
यही सभी धर्मो का
सार।
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