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सौभाग्य से मिलता है सेवा का अवसर

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नेक राह के मुसाफिर हम सुबह से रात तक अपनी व्यक्तिगत व पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझे रहते है , ऐसे में हम अपने सामाजिक कर्तव्य को भूल जाते हैं। ईश्वर ने हमें इस योग्य जरूर बनाया है कि हम थोड़े - थोड़े सहयोग से किसी जरूरतमंद की मदद कर सकें , यह सेवा का सौभाग्य हमें किसी न किसी के माध्यम से मिलता रहता है। सर्दी में ठिठुरते जरूरतमंदों के दर्द को देखकर कुछ लोग अपने दो कदम बढ़ाकर मुहिम शुरू कर देते है देखते ही देखते वह कारवाँ बन जाती है , बड़े कार्य की शुरुआत हमेशा पहले दो कदम से होती हैं , कुछ लोग इस कहावत को सही साबित कर देते है।   एक ऐसा ही मुहिम नैक राह के मुसाफिर के टीम लीडर स्वरुप जी सोलंकी सर और केशव जी सर के सहयोग से पूर्ण हुआ।   इन लोगों ने कुछ मित्रगणों का एक ग्रुप बनाया इस समूह में साथियों ने दिल खोलकर सहयोग किया है , जरूरतमंदों के लिए 100 से भी ज्यादा कम्बल खरीदना अपने आप में प्रेरणादायक व अनुकरणीय कार्य था।     " वस्त्रदान अभियान" में 10 दिसम्बर ( शनिवार ) को रात्रि 8 बजे से जोधपुर शहर के प्रमुख स्थानों पर जरूरतमंद लोगों को सर्दी से बचाव हेतु कम्बल ...

योग जगत में ऋषी-मुनि के 8 नियम

योग जगत में ऋषी-मुनि के 8 नियम

 

"यम" के परिलक्षण, सिद्धि एवं फल

 

परिचय:-  योगशास्त्रों में योग और ध्यान का निरूपण करते हुए अपने अनुभवों के आधार पर ज्ञानियों ने प्रथम योग साधन में चार द्वार बताए है जो ईश्वर की अनुग्रह के बिना किसी भी जीव को प्राप्त होने अतिकठिन हैं। जिसमें :-

 

·        प्रथम तो स्त्रीआदिकविषयों का परित्याग होना

·        द्वितीय सर्व प्रकार से योग साधन की सामग्री की अनुकूलता होना

·        तीसरे योगविद्या के जानने वाले गुरु का समागम होना

·        चौथा ईश्वर का आराधन करना यह प्रमुख मार्ग है।

 

यह चार योग के ऋषि-मुनि लोकों ने मुख्य द्वार बताए हैं क्योंकि इनके बिना कड़ोरो जन्मों में भी योग की सिद्धि का सफल होना संभव नहीं है।

 

तथा योग के आठ अंग साधक पुरुषों को समझने चाहिए। जिनके साधन करने से यह जीव कैवल्य मोक्ष पद को प्राप्त होता है।

 

यह योग के आठ अंग योगी लोकों ने कथन किये हैं :-

योग जगत में ऋषी-मुनि के 8 नियम


1. यम

2. नियम

3. आसन

4. प्राणायाम

5. प्रत्याहार

6. धारणा

7. ध्यान

8. समाधि

 

अब क्रम से इन आठों के पतंजलि याज्ञवल्क्य आदि मुनि लोकों के मत के अनुसार भिन्न भिन्न लक्षण निरूपण करते हैं।

 

यम के पांच नियम जानने योग्य है:-

 


अहिंसा

किसी भी प्राणी को किसी भी प्रकार से पीड़ा न पहुंचाना अर्थात् मन में सभी जीवधारियों के प्रति प्रेमभाव रखना अहिंसा है। काम-क्रोध आदि भावनाओं के जाल में फंस कर शरीर, वाणी अथवा मन से किसी भी प्राणी को शारीरिक या मानसिक पीड़ा अथवा नुकसान पहुंचाना हिंसा है। पांचों यमों में अहिंसा को सर्वोत्तम माना गया है। यम के चार अंगों सत्य, अस्तेय, ब्रह्माचर्य, अपरिग्रह एवं नियमों का पालन अहिंसा की भावना को सुदृढ़ करने के लिए ही किया जाता है।

 

सत्य

सत्य वह है, जैसा देखा, अनुमानित किया या सुना हो- वैसा ही वर्णन करना। लेकिन इसकी एक और शर्त भी है - इस सत्य से प्राणियों का कल्याण होना चाहिए। महाभारत में प्राणी मात्र के लिए हितकारी सत्य को ही श्रेष्ठ बताया गया है।

 

अस्तेय

धर्म विरुद्ध, चोरी से या अन्यायपूर्वक किसी की चीजों को हड़प लेना स्तेय है। इसके विपरीत परायी वस्तु की ओर आकर्षित न होना, उसे ग्रहण न करना, उसकी अभिलाषा न रखना अस्तेय है।

 

ब्रह्मचर्य

उपस्थेन्द्रिय अर्थात् जननेन्द्रिय का संयम ब्रह्मचर्य कहलाता है। उपस्थेन्द्रिय सभी इन्द्रियों में सबसे ज्यादा कामाग्नि को भड़काने वाली है। दूसरी इन्द्रियां भी कामोद्दीपन में सहायक होती हैं। इसलिए सभी इन्द्रियों को शान्त रखने के लिए उपस्थेन्द्रिय पर संयम करना चाहिए।

 

अपरिग्रह

चारों ओर से भोग साधनों को ग्रहण करना परिग्रह है। इसके विपरीत भोग साधनों को ग्रहण न करना अपरिग्रह कहलाता है। धन सम्पत्ति व भोग सामग्री को आवश्यकता से अधिक केवल अपने भोग के लिए संचित करना गलत माना जाता है।

 

योग के आठ अंग में यम को धारण करने से विभिन्न लक्षण और फल परिलक्षित होते है:-

 

·        अहिंसा पालन करने से सर्वभूत प्राणियों से मित्रता होती है।

 

·        सत्य भाषण करने से अमोघ वाणी होती है।

 

·        अस्तेय से नाना प्रकार के मनोवांछित पदार्थों की प्राप्ति होती है।

 

·        ब्रह्मचर्य से मानसिक शक्ति की वृद्धि होती है।

 

·        अपरिग्रह से अध्यात्म विचार की उत्पत्ति हाती है

 

इस प्रकार से चित्त के जीतने वाले योगी को यमों की परिपक्कावस्था में उक्त फलों की प्राप्ति होवे है।


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