सौभाग्य से मिलता है सेवा का अवसर
ध्यान : अंतर्द्वंद्व से ब्रह्म तक का सफर
ध्यान में अगर आपका मन नहीं है लग रहा है तो वह ध्यान नहीं है…. हर ध्यान में आनंद आना चाहिए। अगर ध्यान में एक बार की समाधि में बैठने के बाद मन नहीं लग रहा है तो ऋषि-मुनियों ने 7 पायदान बताएँ है। यह ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग भी है। आप चाहे तो जल्दी से भाग के उस सीढ़ी के द्वारा चढ़ जाओ या धीरे-धीरे उस मार्ग पर जाओ जो आपको सत्यता के दर्शन कराता है। आपके ध्यान में प्रभु को लाता है और आपके लक्ष्य तक पहुँचने का सही मार्ग बताता है।
1. दास्य भाव : आपका कोई नाम नहीं। आपकी कोई पहचान नहीं। आपका कोई देश नहीं, गाँव नहीं। आप कुछ नहीं। आप बस ईश्वर के दास हो और कुछ नहीं। अब आपने स्वयं को दास ईश्वर का मान ही लिया है तो दास की तरह भाव लाना सीखो। मनुष्य की समस्या क्या हैं वह किसी को मानता नहीं है, क्योंकि वह अहम् भाव में जीता है। कोई भी समस्या आ जाए आपको लगता है यह तो मैं सुलझा लुँगा। और बाद में हाथ से निकल जाता है। तो भगवान याद आते है। दास भाव की सेवा में आप अपने स्वयं के शरीर की सेवा करो ईमानदारी के साथ, बच्चे दिए हैं उनकी सेवा करो ईमानदारी के साथ। नौकरी हो या और कोई कार्य सेवा जरूर करो पर पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ। ये मान कर कि मैं ईश्वर का बच्चा हूँ पूरी निष्ठा के साथ काम करो और ये सोच कर कि कोई उंगली न उठाई जाए मेरे कार्य पर। कोई गलती न हो जाए इस तरह कार्य करो। ये पहली सीढ़ी है।
2. प्रेम: प्रभु से प्रेम करो, ये तो इश्क है पर इश्क और प्रेम में अंतर है, प्रेम करना मनुष्यता की वृत्ति है, स्वभाव है, आदत है, हर व्यक्ति किसी न किसी से प्रेम करता है, पशु पक्षी भी प्रेम करते हैं, माँ अपने बच्चों से प्रेम करती है, माता-पिता से प्रेम करती है, भाई-बहन से करता है , समाज से, देश से, किसी गाने से प्यार हो जाता है, फिल्म से प्यार हो जाता है, किताब से प्यार हो जाता है। ये इश्क कब होता है जब इसमें पागलपन सवार होता है, यहाँ प्रभु से मुहब्बत होना चाहिए। जुनून वाला साधारण मनुष्य वाला प्यार नहीं होना चाहिए। यही है प्रेम। जैसा प्रेम माँ अपनी संतान से कर रही है, जैसा भाई अपनी बहन से कर रहा है, जैसा प्रेम हमें अपने भगवान से करना चाहिए है, यहाँ भगवान से प्रेम का अर्थ है की मैं सबसे पहले भगवान से प्यार करूँगा, फिर सबको प्यार दूँगा, पर सबसे पहले भगवान को ही चुनुँगा। मेरा प्रेम का प्रमुख पात्र पहले ईश्वर रहेगा। बाकी सभी बाद के पात्र रहेंगे।
3. इन्द्रिय विग्रह : हमारी इच्छा को इन्द्रिय जन्म देती है, ये लालसा ही इच्छाओं को जन्म देती है और इच्छा हमारे मन में तरह-तरह के ख्याल लाती है और हम गलत कार्य कर बैठते हैं, हमें इन्द्रियों से लड़ना नहीं हैं, इन्हे वश में करना है। इन्द्रिय पर वशीकरण करना अध्यात्म मार्ग में उन्नति के द्वार खोलता है।
4. आत्मज्ञान् : ये जब होगा जब स्वयं में शुद्धता होगी और शुद्धता तब आएगी जब हम ईश्वर से प्रेम करने लगेंगे। मनुष्य का अंतिम लक्ष्य क्या है। हम किस लिए जी रहे है। हमें ये तब पता चलेगा जब हमें आत्मज्ञान मिलेगा। आत्मबोध हो जाएगा तब सारी शंकाएँ मिट जाएगी और आत्मज्ञान कैसे मिलेगा जब आप में दास्यभाव होगा, प्रेम भाव होगा। इंद्रियो का विग्रह हो जाएगा। पारिवारिक चीजों से छुटकारा मिल जाएगा। तब हमें पता चलेगा क्या यही सब अंतिम लक्ष्य है मेरा। ये समाज, ये संसार, ये परिवार। मैं कौन हूँ, मै क्या कर रहा था। अब मुझे क्या करना चाहिए। आप किसमें उलझे थे अब तक। जब न इस संसार को रहना है और न मुझे तो मैं उस परम सत्य की तलाश क्यों न करु।
6. मस्ती : आगे बढ़ने पर मस्ती आएगी ये उमंग मस्तिस्क में होगी। ये दिखाई नहीं देगी और देनी भी नहीं चाहिए, क्योंकि दिखाई दे रही है मतलब आप इसका प्रदर्शन कर रहे हो। और आनंद आप में अंदर भरा है वह बाहर दिखाई नहीं देगा। मस्ती ऐसी होनी चाहिए कि आपको किसी चीज की जरुरत न पड़े। अंदर इतना आंनद भर जाए कि बाहर हमें झांकने की जरुरत न पड़े। आपको परम तत्त्व आत्मज्ञान मिल गया होगा तब और आपको क्या चाहिए होगा। मस्ती ऐसी होनी चाहिए कि हमें किसी और सांसारिक वस्तु या चीज की जरुरत न रहे। किसी भी हाल में रहे पर पुर्ण रहे। तब हममे मस्ती आएगी और सत्य का पायदान खुलेगा।
7. सत्य : सत्य क्या है कि मैं ब्रह्म का अंश हूँ। ब्रह्म पूर्ण है। तब मैं भी तो ब्रह्म बन सकता हूँ। जब पता है कि मैं अंश हूँ ब्रह्म का तो ब्रह्म ही में लीन क्यों न हो जाऊँ। जब ये संकल्प बन जाए कि मैं अंश हूँ ब्रह्म का तो मैं ब्रह्म से साक्षात्कार क्यों न कर लू।
ध्यान है तो मन पर नियंत्रण है।👌👌
ReplyDeletebilkul thik kha sir
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