सौभाग्य से मिलता है सेवा का अवसर
हरि और ओम का रहस्य
परिचय : लाखों हिंदू दिन में कई कई बार तीन-चार शब्दों का प्रयोग करते हैं जिनमें है-हरि, हरे, हरि ओम, हर, हरे कृष्ण, हर हर। शायद ही किसी ने सोचा होगा कि अर्थ क्या है इसका। क्यों बोल रहे हैं। यह तो समझ में आता है कि यह संबोधनात्मक शब्द है। हिंदी संस्कृत में है परमात्मा! है ईश्वर! जब हम हरे राम हरे कृष्ण कहते हैं तो इस हरे शब्द का क्या अर्थ है। या हरि ओम कहते हैं तो इस ओम के साथ हरि का क्या अर्थ है। यह समझने की बात है।
हरि शब्द का अर्थ: हरि शब्द का कई अर्थ है। संस्कृत में भी कई अर्थ है। हिंदी में भी कई अर्थ है। हिंदी में तो कई अद्भुत प्रकार के अर्थ होते हैं। हरि विष्णु भी है। शिव भी है। बंदर भी है। घोड़ा भी है। शेर भी है। वायू भी है। मेंढक भी है। किरण भी है। कितने अर्थ है- लेकिन सबसे महत्वपूर्ण अर्थ है- वह हरा है। हरा रंग हरियाली का प्रतीक है, हरियाली सुख समृद्धि का प्रतीक है। हम जब हरि ओम कहते हैं, या हरे राम कहते हैं, हरी कृष्ण कहते हैं, तो हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हमारा जीवन हरा-भरा बना दो प्रभु। हमें सब सुख समृद्धि दे दो प्रभु।हरिहर का आध्यात्मिक अर्थ : हरि और हर यह दो
शब्दों का आध्यात्मिक अर्थ है। हरि का अर्थ है मातृशक्ति और हर का अर्थ है पुरुषशक्ति। इसलिए शिव को हर कहते हैं पुरुषशक्ति। लेकिन यह सृष्टि के दोनों शक्तियां समाहित हो
जाती है तब यह हरिहर बन जाता है। शिव और पार्वती दोनों एक हो जाते हैं तब हम
उन्हें अर्धनारीश्वर के रूप में देखने लगते हैं। आधा शरीर
पुरुष का है आधा शरीर नारी का है। हर या हरि इनका दोनों अर्थ हम ईश्वर से मानते
हैं। हरियाली भी मानते हैं। सुख समृद्धि भी मानते हैं। और विस्मृतियों का हरण भी मानते हैं।
ओम का अर्थ : ओम
साधारण शब्द नहीं है बहुत गहरे अर्थ वाला शब्द है। इसके 3 भाग है। ‘अ’ ‘ऊ’ ‘म’
बच्चा जब पहली बार बोलता है,
पैदा होने के बाद तो पहला अक्षर ‘अ’ बोलता है। फिर जब उसका मुंह पूरा खुलता है तो ‘ऊ’ बोलता है। और जब उसके दोनों होठ बंद होते हैं तो ‘म’ की ध्वनि निकलती है तो इसका अर्थ क्या हुआ ओम।
ओम सृष्टि की आधी ध्वनि है : ओम सृष्टि के आदि ध्वनि है। सृष्टि का उद्भव जहां से हुआ है वह ओम है। ओम को
प्रणव कहा गया है। प्रणव का अर्थ है ईश्वर। प्रणव तीन अक्षरों से मिलकर बना
है। अ ऊ म। अ का मतलब है- आगे भाग उत्पत्ति, ऊ का अर्थ है- उत्कर्ष, विकास, उन्नति करना। सामाजिक दृष्टि से, शारीरिक
दृष्टि से, आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नति करना। म का अर्थ है- मौन, ब्रह्म की अवस्था,
परमानंद की अवस्था। चैतन्या अवस्था। ब्रह्म
का वह रूप जहा कोई स्वर नहीं कोई ध्वनि नहीं। कोई आवाज नहीं कोई
चिंता नहीं कोई दुख नहीं कोई सुख नहीं। ऐसी स्थिति को म कहते हैं।
वेद की दृष्टि से ओम का अर्थ : वेदों
में वैदिक प्रार्थना में ओम का तो यही अर्थ है।
वेदों की प्रार्थना में ओम जो है प्रणव है। वह हमारी रक्षा
करें और हमारे और दूसरों की रक्षा करने की शक्ति दे। लेकिन पुराणों मैं भी उनका और हरे का बार-बार जिक्र आया है। लेकिन
हरि शब्द 15 शताब्दी में प्रचलित हुआ। 15 शताब्दी में इसका प्रचार जो हुआ वह आज तक उसी प्रकार
चलता आ रहा है।
गुरुनानक जी की दृष्टि में ओम का
अर्थ : ओम की व्याख्या गुरु नानक जी ने भी की। लेकिन गुरु नानक जी ने बहुत ही स्पष्ट कर दिया-उनके आगे एक लगा दिया और ओम के ऊपर का भाग है- उसे खुला छोड़ दिया। एक ओंकार। ओम को खुला छोड़ने का अर्थ क्या है-असीम, ब्रह्म। ब्रह्म
जिसकी कोई सीमा नहीं है।
और आपके उत्कृष्ट की भी कोई सीमा नहीं है। आध्यात्मिक
उन्नति करते करते आप चरम तक पहुंच सकते हो। और आगे जो एक लगा
है उसका अर्थ क्या है यह सृष्टि जो एक है। और ब्रह्म इस सिस्टम के साथ एक में जुड़ा हुआ है। सृष्टि और ब्रह्म को
अलग करके हम नहीं देख सकते।
चैतन्य महाप्रभु जी की दृष्टि में ओम
का अर्थ : ओम जब प्रचलित हो गया चैतन्य महाप्रभु ने ओम का
प्रचार किया। चैतन्य महाप्रभु ने हरि का प्रचार किया। हरि के
प्रचार से क्या हुआ। हरि सहस्त्रनाम में विष्णु का हरि जो नाम है वह हरि का नाम बन गया। 560वां जो नाम है विष्णु सहस्त्रनाम में वह
हरि है। और 200वां
जो नाम है वह सिंह है। शेर शिव भी बन गया। चैतन्य महाप्रभु
के बाद आज तक जो सब लोग बोल रहे हैं आप भी बोल रहे हैं। लेकिन आपको यह नहीं पता जब
आप हरि राम हरि कृष्णा बोलते हो तो आप मातृशक्ति को छोड़
देते हो। मातृशक्ति हरिहर के उच्चारण में है। हर के उच्चारण
में नहीं है इसलिए आज तक मां दुर्गा को कोई हरे दुर्गा नहीं बोल सका। हरे राम हरे कृष्णा हरे शिव कहते हैं। मातृशक्ति को नहीं कहते इसलिए उसको माइनस करके अलग करके केवल मात्र एक शब्द के स्तुति करना,
वन्दना करना है।
निष्कर्ष : ओम जब प्रचलित हो गया तो यह भारत
की संस्कृति बन गया। संस्कृति में हम
अर्थ नहीं जानना चाहते है केवल रग में जैसा लोग कर रहे है वैसा देखकर हम अपने बचपन
से करते है कुछ शब्दों का सबसे महत्वपूर्ण है हर हर महादेव। हर का अर्थ है प्रत्येक।
प्रत्येक व्यक्ति महादेव है। अर्थ है हर व्यक्ति के अंदर परमात्मा का अंश आत्मा के
रुप में विद्यमान है। और अगर उसका उत्कर्ष हो जाए उससे परिचय हो जाए। अगर आत्म तत्व
को आत्मसात् कर लिया जाए। शरीर नगण्य हो जाए। केवल आत्मा ही रह जाए। तो फिर आत्मा परमात्मा
में विलिन हो सकती है। तो प्रत्येक व्यक्ति में ब्रह्मत्व है। हरहर महादेव का अर्थ
है- हर प्राणी हर व्यक्ति जो है वह महादेव बनने के योग्य है। ऐसी स्थिति में जो भी
शब्द आप बोलते हो तो उस पर ध्यान दे दो। जब हरे कहते हो तो हरियाली जीवन की मांग रहे
हो। पापो का हरण मांग रहे हो। और जब हर हर महादेव कह रहे हो। तो अपने अंदर की आत्मशक्ति
की बात कर रहे हो। जिस आत्मशक्ति को पहचानने वाले कम लोग है। जिस आत्मशक्ति से परिचय
प्राप्त करके ब्रह्मत्व को प्राप्त करने वाले कम लोग है। उस रास्ते पर चलने के लिए
इन शब्दो का प्रयोग करो तो जीवन सफल हो जाएगा।
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