जीवमात्र के उद्धार का सार : योग और ध्यान
मानव कल्याण और जीवोद्धार के लिए प्राचीनतम ऋषि-मुनियों और आचार्यो द्वारा बताई गई पुरे जीवनकाल का सार था-ध्यान, ज्ञान और योग साधना।
आप सभी महाशय को इस बात का पता है कि योगविद्या जीवात्मा की उन्नति का एक मुख्य साधन रहा है। वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहासादि ग्रंथों में सभी जगह योग का प्रतिपादन हुआ है। भारत के अलावा चीन, तिब्बत, जापान, अमेरिका आदि देशों में तथा वेदांत, बौद्ध, जैन, शैव, वैष्णवादि में योग का आदर हुआ है। महादेव, मत्स्येन्द्र, गोरक्ष, पतंजलि, वसिष्ठ, वामदेवादिक बडे-बडे देवता ऋषि-मुनियों ने योग का साधन किया है। इतिहासों में प्रसिद्ध है और जो-जो मनुष्य शक्ति से विलक्षण उत्कृष्ट गुण ऋषि-मुनियों में सुनने में आते हैं ये सभी योगविद्या के प्रभाव से ही उनको प्राप्त हुये थे।
वर्तमान में हम जिसे चमत्कार समझ कर असंभव बतलाते हैं ये इस योगविद्या के प्रतिपादक पातंजल, गोरक्षसंहिता, योगियाज्ञवल्क्यसंहिता, शिवसंहिता, योगबीज, अनेक ग्रंथ विद्यमान हैं जिनमें भिन्न भिन्न प्रकरणों में योग के साधनों से किया है।

- योगरूपी निद्रा को ग्रहण करके जो शेषनाग की शय्या पर शयन करते हैं ऐसे जो दिव्यस्वरूप विष्णुभगवान् हैं जिनके चरणकमलों के प्रति मैं सर्वदाकाल नमस्कार करता हूँ।
- सर्व योगियों के मुख्य अधिपति जो शिवजी हैं जिनको नमस्कार करके और अपने गुरु के चरणकमलों को नमस्कार करके तथा योगविद्या के आचार्य जो मत्स्येन्द्रनाथ गोरक्षनाथ पतंजलि याज्ञवल्क्य आदि हैं उन सभी को नमस्कार करके साधक पुरुषों को मोक्ष पद की सिद्धि के लिये ध्यान और योग में बताई गई विधियों का निरूपण करता हूँ।
- ध्यान और योग को करने से प्राण और अपान की एकता होती है। चित्त और आत्मा की एकता होती है। तथा जीव और ईश्वर की एकता होती है। ऐसा योग है जिसे मोक्ष की आंकाक्षा लिए सर्वदाकाल से प्राचीनतम ज्ञानी ऋषि-मुनियों द्वारा अभ्यास करता चला आया है।
- अनेक प्रकार के जप तप तीर्थ दान आदि ये सभी स्थूल क्रियाओं के समूह हैं यह सभी मनुष्य की मुक्ति के लिए साक्षात् समर्थ नहीं हो सकते है। इन सभी से शीघ्र जीव मात्र की मुक्ति संभव नहीं है। मुक्ति के लिए योग और ध्यान का अभ्यास करना ही श्रेष्ठ है।
- तत्त्वज्ञान से कैवल्यमोक्ष का ज्ञान होता है। पर ज्ञान योग रुपी शुष्कज्ञान होता है। इसके लिए हमें योग और ध्यान को महत्व देना ही होगा।
- ध्यान और योग जिसके करने से अणिमा महिमा आदि अनेक सिद्धियों की प्राप्ति होती है। जिसके करने से उन्मुक्त होकर योगी स्वतंत्र जगत में विचरता है जिस योगमार्ग का बुद्धिमान् पुरुषोंको अवश्य आश्रयण करना चाहिए।
- अर्थशास्त्रों के शुष्कविवादों में बुद्धिमान पुरुष को अपनी आयु व्यतीत नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जैसे दीपक की वार्ता करने से अंधकार का नाश नहीं हो सकता है। उसी प्रकार केवल शास्त्रों की वार्ता करने से संसार बंधन की निवृत्ति नहीं हो सकती है।
- इन्द्रियों के विषयों में आसक्त और शरीर में अध्यासवाले तथा आलस करके क्षीण बुद्धिवाले जो पुरुष हैं वे अष्टांगयोग साधने का परिश्रम नहीं कर सकते हैं वे मात्र शास्त्र का आलंबन ही करते है।
- इसलिए विवेकी पुरुष को प्रथम शास्त्रों का विचार करने के पश्चात् योग और ध्यान का अभ्यास करना चहिए जैसे कि वसिष्ठादिक और शुकदेवादिक पहले के ऋषि-मुनि करते थे।
- शैव वैष्णव शाक्त आदि सर्वमतों में सभी योग का विधान किया है बुद्धिमान पुरुष को योग और ध्यान की अवश्य साधना करनी चाहिए।
- पातंजलीदर्शन शिवसंहिता याज्ञवल्क्य संहिता गोरक्षशतक हठयोगप्रदीपिका आदि अनेक योगशास्त्रों में योग और ध्यान का निरूपण और अपने अनुभवों का सार बताया गया है।
बहुत ही शिक्षाप्रद और रौचक जानकारी
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