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सौभाग्य से मिलता है सेवा का अवसर

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नेक राह के मुसाफिर हम सुबह से रात तक अपनी व्यक्तिगत व पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझे रहते है , ऐसे में हम अपने सामाजिक कर्तव्य को भूल जाते हैं। ईश्वर ने हमें इस योग्य जरूर बनाया है कि हम थोड़े - थोड़े सहयोग से किसी जरूरतमंद की मदद कर सकें , यह सेवा का सौभाग्य हमें किसी न किसी के माध्यम से मिलता रहता है। सर्दी में ठिठुरते जरूरतमंदों के दर्द को देखकर कुछ लोग अपने दो कदम बढ़ाकर मुहिम शुरू कर देते है देखते ही देखते वह कारवाँ बन जाती है , बड़े कार्य की शुरुआत हमेशा पहले दो कदम से होती हैं , कुछ लोग इस कहावत को सही साबित कर देते है।   एक ऐसा ही मुहिम नैक राह के मुसाफिर के टीम लीडर स्वरुप जी सोलंकी सर और केशव जी सर के सहयोग से पूर्ण हुआ।   इन लोगों ने कुछ मित्रगणों का एक ग्रुप बनाया इस समूह में साथियों ने दिल खोलकर सहयोग किया है , जरूरतमंदों के लिए 100 से भी ज्यादा कम्बल खरीदना अपने आप में प्रेरणादायक व अनुकरणीय कार्य था।     " वस्त्रदान अभियान" में 10 दिसम्बर ( शनिवार ) को रात्रि 8 बजे से जोधपुर शहर के प्रमुख स्थानों पर जरूरतमंद लोगों को सर्दी से बचाव हेतु कम्बल ...

ध्यान : शान्ति अंर्तमन की

ध्यान : शान्ति अंर्तमन की

ध्यान में हमारी सबसे बड़ी समस्या रहती है- ध्यान के भटकाव की। मनुष्य सोचता बहुत है और जब वह ध्यान करने लगता है तो हजारों ख्याल एक साथ आने भी लगते हैं। वैसे इसे रोका नहीं जा सकता। हमारे दिमाग में एक नस है जो सोचने का कार्य करती है। हम उसे रोक नहीं सकते इसलिए ख्याल आने को भी रोक नहीं सकते। हमें कोई विचार न आए ये विचार करके हम ध्यान करने लगते हैं। सारे विचार को त्याग कर एक विचार दिमाग में रख लेना भी तो एक विचार है। अगर रोका जाए तो ब्रेन हेमरेज हो जाएगा। हाँ, अच्छा रहेगा हम विचारशून्य हो जाए। अभ्यास से यह संभव है। प्राचीन समय में हमारे ऋषि-मुनियों के आश्रम में और वर्तमान में ध्यान केन्द्रों में आज भी अलग-अलग तरीके से ध्यान कराए जाते हैं। कुछ लोग शिविर भी लगा रहे हैं। चाहे कोई भी मार्ग से चलें हमें ध्यान करना सीखना है और यह आना चाहिए।

हमारे ऋषि-मुनियों ने एकाग्रचित ध्यान करने के 5 मार्ग बताएँ हैं, जो सरल और कारगर भी है। ध्यान की कुछ विद्या है। जिस तरह आप अपने शरीर के बाकी हिस्सों पर नियंत्रण करना सीख गए हैं उसी प्रकार ध्यान पर भी नियंत्रण करना संभव है।

1. दृष्टिनिरोध - अपनी दृष्टि किसी एक वस्तु पर टिका देना। जैसे आप अपना अँगूठा देख लें। उसे किसी रंग से रंग लें। जब तक आपका अँगूठा एक नाखून न रह जाए, नाखून से धीरे-धीरे एक बिन्दु न रह जाए। तब तक देखते रहें। इसे थोड़ा-थोड़ा रोज करते रहें और अपने नाखून को एक बिन्दु तक ले जाए। आपका ध्यान लगने लगेगा।  

2. श्वास को रोकना – आप श्वास को तब तक रोके रखें। जितना आपका शरीर बर्दाश्त कर सके। जबरदस्ती नहीं करना है। इससे ज्यादा नहीं। प्राचीन समय में ऋषि-मुनि ये अभ्यास किया करते थे। नाक बंद करते पानी में डुबे रहते। वे घंटो पानी में रहते थे और बाद में निकलते थे। हम ऐसा बाद में अपने घर पर भी कर सकते हैं और वैसे भी पानी के अंदर हम रहेंगे तो हमारा ध्यान तो स्वत: श्वास पर ही रहेगा कि कहीं हम मर ही न जाए। ऐसा करने से हमारे ध्यान का भटकाव कम होने लगेगा और ध्यान बढ़ेगा। धीरे-धीरे बिना पानी के रहकर हम यह अभ्यास कर सकते हैं। जिससे श्वास पर नियंत्रण रखना आसान हो जाएगा।

3. श्रवण कीर्तन: हम कोई भक्ति संगीत कैसेट लगाते हैं। शिव स्तुति, गायत्री मंत्र। उस संगीत को सुनना उसका मनन करना। साथ साथ बोलना भी कीर्तन की श्रेणी में ही आता है। एक होता है 50 लोग मिलकर श्रवण कीर्तन करते हैं, इसे सामूहिक कीर्तन कहते हैं। पर एक व्यक्तिगत कीर्तन भी होता है। यह अकेले मनन करते हुए, प्रभु का चिंतन करते हुए किया जाता है।  जब भी भक्त तन्मयता से भजन-कीर्तन करते हैं उनके मन में किसी भी तरह का राग-द्वेष नहीं रहता। कीर्तन करने से केवल भगवान की भक्ति ही नहीं होती, बल्कि इससे मन की अशुद्धियाँ और दुगुर्ण भी दूर होते हैं। यही कारण है कि भजन-कीर्तन करने वालों के मन शांत होते हैं और जब वे किसी भी कार्य को करते हैं तो पूरी तन्मयता के साथ करते हैं। 

4. नाम जप – प्रभु का कोई नाम ले लो उसमें इतना खो जाओ। उसको अपने अंर्तमन में इतना रमाओ और घुमाओ कि कोई सुध-बुध न रहे, जैसे- मीरा बाई प्रभु श्री कृष्ण भगवान के चरित्र, लीला, महिमा, गुण, नाम तथा उनके प्रेम एवं प्रभावों में खो जाती थी। जैसे- श्री राम भक्त हनुमान प्रभु श्री राम नाम में खो जाते थे।  

5. जप (अजपा जप) -  सबसे प्रभावी और कारगर ध्यान को केन्द्रित करने वाला बार-बार मनन करते हुए आंतरिक मन में किसी मंत्र, नाम को जपना होता है और आत्मिक प्रगति में सहायक अजपा है। हम जितना इसे बोलते हैं इससे ऊर्जा बनती है। यह ऊर्जा हमारे शरीर के अंदर घूमती है। आध्यात्म में ऐसी ऊर्जा सकारात्मक विकास करती है। हर श्वास को लेते और छोड़ते समय ओम की ध्वनि का ध्यान करते हुए ध्याता व ध्येय में एकाकार की स्थिति का अनुभव करना ही अजपा जाप है।   

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


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