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सौभाग्य से मिलता है सेवा का अवसर

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नेक राह के मुसाफिर हम सुबह से रात तक अपनी व्यक्तिगत व पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझे रहते है , ऐसे में हम अपने सामाजिक कर्तव्य को भूल जाते हैं। ईश्वर ने हमें इस योग्य जरूर बनाया है कि हम थोड़े - थोड़े सहयोग से किसी जरूरतमंद की मदद कर सकें , यह सेवा का सौभाग्य हमें किसी न किसी के माध्यम से मिलता रहता है। सर्दी में ठिठुरते जरूरतमंदों के दर्द को देखकर कुछ लोग अपने दो कदम बढ़ाकर मुहिम शुरू कर देते है देखते ही देखते वह कारवाँ बन जाती है , बड़े कार्य की शुरुआत हमेशा पहले दो कदम से होती हैं , कुछ लोग इस कहावत को सही साबित कर देते है।   एक ऐसा ही मुहिम नैक राह के मुसाफिर के टीम लीडर स्वरुप जी सोलंकी सर और केशव जी सर के सहयोग से पूर्ण हुआ।   इन लोगों ने कुछ मित्रगणों का एक ग्रुप बनाया इस समूह में साथियों ने दिल खोलकर सहयोग किया है , जरूरतमंदों के लिए 100 से भी ज्यादा कम्बल खरीदना अपने आप में प्रेरणादायक व अनुकरणीय कार्य था।     " वस्त्रदान अभियान" में 10 दिसम्बर ( शनिवार ) को रात्रि 8 बजे से जोधपुर शहर के प्रमुख स्थानों पर जरूरतमंद लोगों को सर्दी से बचाव हेतु कम्बल ...

सृष्टी का नियम

सृष्टि का नियम   एक कारोबारी सेठ सुबह सुबह जल्दबाजी में घर से बाहर निकल कर ऑफिस जाने के लिए कार का दरवाजा खोल कर जैसे ही बैठने जाता है, उसका पाँव गाड़ी के नीचे बैठे कुत्ते की पूँछ पर पड़ जाता है.... दर्द से बिलबिलाकर अचानक हुए इस वार को घात समझ वह कुत्ता उसे जोर से काट खाता है।  गुस्से में आकर सेठ आसपास पड़े 10-12 पत्थर कुत्ते की ओर फेंक मारता है पर भाग्य से एक भी पत्थर उसे नहीं लगता है और वह कुत्ता भाग जाता है।  जैसे तैसे सेठजी अपना इलाज करवाकर ऑफिस पहुँचते हैं जहां उन्होंने अपने मैनेजर्स की बैठक बुलाई होती है....यहाँ अनचाहे ही कुत्ते पर आया उनका सारा गुस्सा उन बिचारे मैनेजर्स पर उतर जाता है।  वे प्रबन्धक भी मीटिंग से बाहर आते ही एक दूसरे पर भड़क जाते हैं....बॉस ने बगैर किसी वाजिब कारण के डांट जो दिया था।  अब दिन भर वे लोग ऑफिस में अपने नीचे काम करने वालों पर अपनी खीज निकलते हैं ऐसे करते करते आखिरकार सभी का गुस्सा अंत में ऑफिस के चपरासी पर निकलता है  जो मन ही मन बड़बड़ाते हुए भुनभुनाते हुए घर चला जाता है....घंटी की आवाज़ सुन कर उसकी पत्नी दरवाजा खोलती है और हमेशा...

प्रणाम का महत्व

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                             प्रणाम का महत्व   महाभारत का युद्ध चल रहा था- एक दिन दुर्योधन के व्यंग्य से आहत होकर "भीष्म पितामह" घोषणा कर देते हैं कि-   " मैं कल पांडवों का वध कर दूँगा"   उनकी घोषणा का पता चलते ही पांडवों के शिविर में बेचैनी बढ़ गई-   भीष्म की क्षमताओं के बारे में सभी को पता था इसलिए सभी किसी अनिष्ट की आशंका से परेशान हो गए |   तब - श्री कृष्ण ने द्रौपदी से कहा अभी मेरे साथ चलो -   श्रीकृष्ण द्रौपदी को लेकर सीधे भीष्म पितामह के शिविर में पहुँच गए -   शिविर के बाहर खड़े होकर उन्होंने द्रोपदी से कहा कि - अन्दर जाकर पितामह को प्रणाम करो -   द्रौपदी ने अन्दर जाकर पितामह भीष्म को प्रणाम किया तो उन्होंने-   " अखंड सौभाग्यवती भव" का आशीर्वाद दे दिया , फिर उन्होंने द्रोपदी से पूछा कि !!   " वत्स , तुम इतनी रात में अकेली यहाँ कैसे आई हो , क्या तुमको श्रीकृष्...

श्रीकृष्ण को जिन सोलह कलाओं से परिपूर्ण कहा जाता है, वे कलाएं कौन सी हैं?

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  श्रीकृष्ण को जिन सोलह कलाओं से परिपूर्ण कहा जाता है, वे कलाएं कौन सी हैं? प्रभु श्रीराम 12 कलाओं के ज्ञाता थे तो भगवान श्रीकृष्ण सभी 16 कलाओं के ज्ञाता हैं। चंद्रमा की सोलह कलाएं होती हैं। और ब्रह्म यानि की स्वयं ईश्वर 16 कलाओं से युक्त होते हैं और फिर भगवान शिव जी 64 कलाओं में पारंगत हैं और उन्हें 64 कलाओं का पूर्ण ज्ञान है ।। सामान्यत मनुष्य के पास 5 कला तक होती है और अगर उसे उसका ज्ञान और भान हो तब ठीक है ।। यहां पर भगवान श्रीकृष्ण जी के 16 कलाओं के बारे में जानकारी दी गई है ।। भगवान श्रीकृष्ण सोलह कलाओं से युक्त थे। श्रीकृष्ण जी में ही ये सारी खूबियां समाविष्ट थी। श्री कृष्ण जिन सोलह कलाओं को धारण करते थे उनका संक्षिप्त विवरण यह है। भगवान कृष्ण की ये वो 16 कलायें हैं, जो हर किसी व्यक्ति में कम या ज्यादा होती हैं। कला 1- श्री संपदा श्री कला से संपन्न व्यक्ति के पास लक्ष्मी का स्थायी निवास होता है। ऐसा व्यक्ति आत्मिक रूप से धनवान होता है। ऐसे व्यक्ति के पास से कोई खाली हाथ वापस नहीं आता। इस कला से संपन्न व्यक्ति ऐश्वर्यपूर्ण जीवनयापन करता है। कला 2- भू संपदा जिसके भीतर पृथ्वी प...

निमित्त होने का घमंड कैसा ??

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निमित्त होने का घमंड कैसा ?? आज हमने  भोजन करवाया। आज हमने ये बांटा, आज हमने वो दान किया एक लकड़हारा रात-दिन लकड़ियां काटता, मगर कठोर परिश्रम के बावजूद उसे आधा पेट भोजन ही मिल पाता था। एक दिन उसकी मुलाकात एक साधु से हुई। लकड़हारे ने साधु से कहा कि जब भी आपकी प्रभु से मुलाकात हो जाए, मेरी एक फरियाद उनके सामने रखना और मेरे कष्ट का कारण पूंछना। कुछ दिनों बाद उसे वह साधु फिर मिला।  लकड़हारे ने उसे अपनी फरियाद की याद दिलाई तो साधु ने कहा कि- "प्रभु ने बताया हैं कि लकड़हारे की आयु 60 वर्ष हैं और उसके भाग्य में पूरे जीवन के लिए सिर्फ पाँच बोरी अनाज है। इसलिए प्रभु उसे थोड़ा अनाज ही देते हैं ताकि वह 60 वर्ष तक जीवित रह सके। समय बीता। साधु उस लकड़हारे को फिर मिला  तो लकड़हारे ने कहा "ऋषिवर...!! अब जब भी आपकी प्रभु से बात हो तो मेरी यह फरियाद उन तक पहुँचा देना कि वह मेरे जीवन का सारा अनाज एक साथ दे दें, ताकि कम से कम एक दिन तो मैं भरपेट भोजन कर सकूं।" अगले दिन लकड़हारे के घर पॉच बोरी अनाज पहुँच गया।  लकड़हारे ने प्रभु ने को धन्यवाद दिया कि उसकी फरियाद कबूल कर उसे उसका सारा हिस्सा भेज दि...

महर्षि दधीचि कौन थे और उनकी शिक्षाएँ क्या है की सम्पूर्ण जानकारी

महर्षि दधीचि कौन थे और उनकी शिक्षाएँ क्या है की सम्पूर्ण जानकारी          प्रजापति कर्दमकी कन्या शान्ति से अथर्वा ऋषि का विवाह हुआ था। उससे उन्हें एक परम तेजस्वी पुत्र हुआ। जिसका नाम उन्होंने दधीचि रखा। दधीचि जन्म से ही विरक्त एवं परम शिवभक्त थे।        जब प्रजापति दक्ष ने अपने यज्ञ में शंकरजी का भाग नहीं रखा तो महर्षि दधीचि ने दक्ष को बहुत समझाया। दक्ष ने उनकी बात नहीं मानी, इससे यज्ञमण्डप से उठकर वे अपने आश्रम पर चले गये। अन्त में सती के देह-त्याग के बाद वीरभद्र ने उस यज्ञ का विध्वंस कर दिया।               महर्षि दधीचि बडी कठोर तपस्या कर रहे थे। इन्द्र को लगा कि ये मेरा इन्द्रपद छीनना चाहते हैं, इसलिये उन्होंने कामदेव को और अलम्बुषा नाम की एक सुन्दर अप्सरा को उनकी तपस्या में विघ्न डालने को भेजा। अलम्बुषा महर्षि दधीचि के आश्रम में जाकर गाती हुई नाचने लगी, कामदेव ने अपने सम्मोहन बाण चलाये। किंतु महर्षिका ध्यान नहीं टूटा। उन्होंने आँखें खोली ही नहीं।   ...

क्या आप जानते है ऋषियों और मुनियों द्वारा किये गये आविष्कार!

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  क्या आप जानते है ऋषियों और मुनियों द्वारा किये गये आविष्कार! आचार्य कणाद : - कणाद परमाणुशास्त्र के जनक हैं। आधुनिक दौर में अणु विज्ञानी जॉन डाल्टन के भी हजारों साल पहले आचार्य कणाद ने यह रहस्य उजागर किया कि द्रव्य के परमाणु होते हैं। भास्कराचार्य  :-  आधुनिक युग में धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति (पदार्थों को अपनी ओर खींचने की शक्ति) की खोज का श्रेय न्यूटन को दिया जाता है। किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण का रहस्य न्यूटन से भी कई सदियों पहले भास्कराचार्यजी ने उजागर किया। भास्कराचार्यजी ने अपने ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बारे में लिखा है कि ‘पृथ्वी आकाशीय पदार्थों को विशिष्ट शक्ति से अपनी ओर खींचती है। इस वजह से आसमानी पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है’। आचार्य चरक  : - ‘चरकसंहिता’ जैसा महत्तवपूर्ण आयुर्वेद ग्रंथ रचने वाले आचार्य चरक आयुर्वेद विशेषज्ञ व ‘त्वचा चिकित्सक’ भी बताए गए हैं। आचार्य चरक ने शरीरविज्ञान, गर्भविज्ञान, औषधि विज्ञान के बारे में गहन खोज की। आज के दौर की सबसे ज्यादा होने वाली डायबिटीज, हृदय रोग व क्षय रोग जैसी बीमारि...

मानवजाति ईश्वर की र्स्वश्रेष्ठ रचना है और हम उनकी संतान है

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  मानवजाति ईश्वर की र्स्वश्रेष्ठ रचना है और हम उनकी संतान है प्राचीन समय से हमें ज्ञान मिलता चला आ रहा है कि हम सभी संतान है उस परमात्मा के ये बात भुल नहीं जाना चाहिए। ऋषि-मुनियो द्वारा उनके दिए हुए उपदेशों में, लिखे गए ग्रंथो में और अनेक धर्म समुदायों द्वारा भी बताया गया है कि ईश्वर एक है और हम सभी उनकी संतान है। फिर मानव जाति को किस बात का घंमड है। मनुष्य को स्वयं पर कितना गर्व है। वह स्वयं को जगदीश्वर की अत्युत्तम तथा सर्वश्रेष्ठ कृति समझता है। वह अपने व्यक्तित्व को चिरस्थायी बनाना चाहता है। चिरकाल से मनुष्य यही प्रयत्न कर रहा है कि किसी प्रकार वह उस अप्राप्य अमृत को प्राप्त करे, जिसे पीकर वह अमर हो जाए, किन्तु अभी तक अमृत का पता नहीं लगा। यही कारण है कि जब मनुष्य को प्रतिदिन निकटतम आती हुई रहस्यपूर्ण मृत्यु की याद आ जाती है, तब उसका हृदय तड़पने लगता है। भविष्य में आने वाले अंत के तथा उसके अनन्तर अपने व्यक्तित्व के ही नहीं, सर्वस्व के विनष्ट होने के विचार-मात्र से ही मनुष्य का सारा शरीर सिहर उठता है। मनुष्य चाहता है कि किसी प्रकार वह इस अप्रिय सत्य को भूल जाए और उसे ही भुलान...

हरिवंशवर्णन (श्रीकृष्णकथा)

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  हरिवंशवर्णन (श्रीकृष्णकथा) राम राम दोस्तों आप सभी का हार्दिक स्वागत है…अभिनन्दन है… ब्रह्माजी ने कहा – अब मैं हरिवंश का वर्णन करूँगा, जो भगवान् कृष्ण के महात्म्य से परिपूर्ण होने के कारण श्रेष्ठतम है।             पृथिवी पर धर्म आदि की रक्षा और अधर्मादि विनाश के लिए वसुदेव तथा देवकी से कृष्ण और बलराम का प्रादुर्भाव हुआ।   जन्म के कुछ ही दिन बाद कृष्ण ने पूतना के स्तनों को दृढ़तापूर्वक पीकर उसे मृत्यु के पास पहुँचा दिया था। तद्नन्तर शकट (छकडे़) को बालक्रीडा में उलटकर सभी को विस्मित करते हुए इन्होंने यमलार्जुन-उद्धार, कालियानाग-दमन, धेनुकासुर-वध, गोवर्धन-धारण आदि अनेक लीलाएँ की और इन्द्र द्वारा पूजित होकर पृथिवी को भार से विमुक्त किया तथा अर्जुन की रक्षा के लिए प्रतिज्ञा की।             इनके द्वारा अरिष्टासुर आदि अनेक बलवान् शत्रु मारे गए। इन्होंने केशी नामक दैतय का वध किया तथा गोपों को संतुष्ट किया। उसके बाद चाणूर और मुष्टिक नामक मद्र इनके द्वारा ही पराजित हुए। ऊँ...